




अहमदनगर के छोटे से गांव से शुरू हुआ एक मिशन, जिसने 35,000 से अधिक छात्रों की लिखावट सुधारी और 15,000 से ज्यादा लोगों को अंग्रेजी बोलने में आत्मविश्वास दिया।

लिखावट में छुपा आत्मविश्वास का राज
सफलता की कहानी: महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के अरंगावं गांव में स्थित मेहराबाद से 2008 में एक खास पहल की शुरुआत हुई। इस आंदोलन का नाम है ‘आशा हस्ताक्षर एंड स्पोकन इंग्लिश’, जिसकी नींव रखी शुभाष हिरामन शिंदे ने। उनका उद्देश्य था— लिखावट की कला को पुनर्जीवित करना और अंग्रेजी बोलने की रुचि जगाना।
शुभ handwriting को आत्मविश्वास, एकाग्रता और बेहतर ग्रेड से जोड़ते हुए उन्होंने उन छात्रों को चुना, जिन्हें अक्सर कमजोर या अनदेखा समझा जाता है।
कोविड के बाद बच्चों की शिक्षा में आई गिरावट का समाधान
कोविड महामारी के कारण बच्चों की लेखन क्षमता और पढ़ने की आदतें बहुत प्रभावित हुईं। जब स्कूल दोबारा खुले, तो अभिभावकों को अपने बच्चों की लिखावट और पढ़ने की योग्यता देखकर हैरानी हुई। इसी समय ‘आशा हस्ताक्षर’ लोगों के बीच एक उम्मीद बनकर उभरा।
शिंदे सर के प्रशिक्षण से हज़ारों बच्चों की लिखावट सुधरी और वे फिर से पढ़ाई में रुचि लेने लगे।
भारत से विदेश तक फैला असर
जो पहल एक गांव से शुरू हुई, उसने अब ओमान, दुबई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों तक पहुंच बना ली है। वहां के एनआरआई अभिभावक भी अपने बच्चों को ऑनलाइन कोर्स में जोड़ रहे हैं ताकि उनकी हस्तलिपि और अंग्रेजी संप्रेषण में सुधार हो।
अब तक 35,000+ छात्र और अभिभावक लिखावट सुधार चुके हैं और 15,000+ लोगों ने अंग्रेज़ी बोलना सीखा है, जिनमें गृहिणियां, प्रोफेशनल्स और छात्र शामिल हैं।
कमज़ोर छात्रों पर विशेष फोकस
जहां ज़्यादातर कोचिंग संस्थान सिर्फ तेज़ विद्यार्थियों पर ध्यान देते हैं, वहीं शिंदे सर का केंद्र उन्हीं छात्रों पर ध्यान देता है जो खुद पर विश्वास खो चुके होते हैं। उन्हें मिलता है— व्यक्तिगत मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और आत्मविश्वास।
शिंदे सर कहते हैं, “हम सिर्फ लिखना या बोलना नहीं सिखाते, हम आत्मविश्वास दोबारा जगाते हैं।”
25 वर्षों की सेवा और बदलाव की विरासत
पिछले 25+ वर्षों से शुभाष शिंदे शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव ला रहे हैं। उनके कई छात्र राष्ट्रीय स्तर की लिखावट प्रतियोगिताएं जीत चुके हैं और कई कॉर्पोरेट व अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में सफलता प्राप्त कर चुके हैं।
आज के डिजिटल युग में शुभाष शिंदे का कार्य यह याद दिलाता है कि मूलभूत स्किल्स ही भविष्य की नींव होते हैं। ‘आशा हस्ताक्षर एंड स्पोकन इंग्लिश’ सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि संघर्षरत बच्चों के लिए नई रोशनी है।
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