




भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) और जापान की स्पेस एजेंसी JAXA ने मिलकर चंद्रयान-5 मिशन को अंजाम देने का निर्णय लिया है। इस मिशन का सबसे बड़ा उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर लैंडिंग करना है। यह इलाका वैज्ञानिकों के लिए बेहद रहस्यमयी माना जाता है, क्योंकि यहां पर पानी की बर्फ और कई ऐसे खनिज मौजूद हो सकते हैं जो भविष्य में मानव बस्तियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे।
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां सूर्य की रोशनी बहुत कम पहुंचती है और गहरे क्रेटर्स (गड्ढों) में स्थायी छाया रहती है। माना जाता है कि इन्हीं छायादार इलाकों में पानी की बर्फ जमी हो सकती है। पानी की मौजूदगी का मतलब है भविष्य में ईंधन बनाने, जीवन को बनाए रखने और चांद पर मानव मिशन भेजने की संभावनाएं बढ़ाना।
भारत का चंद्रयान-3 मिशन पहले ही दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग करके इतिहास रच चुका है। अब चंद्रयान-5 मिशन का उद्देश्य इस क्षेत्र का और गहराई से अध्ययन करना और जापान के साथ मिलकर नई तकनीकें विकसित करना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के बीच हुई बातचीत के बाद इस मिशन पर आधिकारिक सहमति बनी। जापान इस मिशन में लैंडर तकनीक और उन्नत रोवर उपकरण प्रदान करेगा, जबकि भारत मिशन का नेतृत्व करेगा और चंद्रयान-5 के लॉन्च व नेविगेशन की जिम्मेदारी उठाएगा।
JAXA पहले से ही अंतरिक्ष तकनीक में अग्रणी रहा है और उसके पास चंद्रमा और मंगल ग्रह से जुड़े कई मिशनों का अनुभव है। वहीं, ISRO ने चंद्रयान-1, मंगलयान और चंद्रयान-3 जैसी उपलब्धियों से अपनी क्षमता साबित की है।
चंद्रयान-5 मिशन की मुख्य विशेषताएं
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लक्ष्य स्थान: चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव
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सहयोगी देश: भारत (ISRO) और जापान (JAXA)
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उद्देश्य:
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चंद्रमा की सतह पर पानी की बर्फ की खोज
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खनिजों और मिट्टी का अध्ययन
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संभावित मानव मिशनों के लिए संसाधनों का आकलन
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रोवर और लैंडर की नई तकनीक का परीक्षण
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लॉन्च की समयसीमा: वर्ष 2027 तक इस मिशन को प्रक्षेपित करने की योजना है।
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रॉकेट और लैंडर: भारत का GSLV Mk-III रॉकेट और जापानी लैंडर का संयुक्त प्रयोग होगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मिशन से न केवल चांद के बारे में नई जानकारी मिलेगी, बल्कि भविष्य में मंगल और अन्य ग्रहों पर मानव मिशन भेजने की तैयारी भी मजबूत होगी। जापान के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मिशन से चंद्रमा की सतह पर बने क्रेटर्स में बर्फ और खनिजों की सटीक पहचान हो सकेगी।
ISRO प्रमुख ने कहा है कि “यह सहयोग केवल तकनीक साझा करने का नहीं, बल्कि दोनों देशों के वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान और अनुभव के आदान-प्रदान का भी प्रतीक है। चंद्रयान-5 मिशन से हमें अंतरिक्ष विज्ञान की नई ऊँचाइयों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा।”
भारत-जापान का यह सहयोग ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका (NASA), यूरोप (ESA), रूस (Roscosmos) और चीन (CNSA) भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर मिशन भेजने की तैयारी कर रहे हैं। खासकर अमेरिका का Artemis मिशन भी इसी क्षेत्र में मानव मिशन भेजने पर केंद्रित है। ऐसे में भारत और जापान की यह साझेदारी एशियाई देशों को वैश्विक स्पेस रेस में और मजबूती प्रदान करेगी।
चंद्रयान-5 मिशन भारत और जापान दोनों देशों के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है। यह न केवल चांद के रहस्यों को उजागर करेगा, बल्कि आने वाले समय में अंतरिक्ष अन्वेषण में भारत-जापान की साझेदारी को वैश्विक मंच पर नई पहचान देगा।