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भारत की विदेश नीति हमेशा से रणनीतिक संतुलन और कूटनीतिक विवेक पर आधारित रही है। इसका ताजा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान में देखा गया, जब उन्होंने कतर की राजधानी दोहा पर हुए इजरायली हमले की निंदा की।
पीएम मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह हमला कतर की संप्रभुता का उल्लंघन है। हालांकि, उन्होंने सीधे तौर पर इजरायल का नाम नहीं लिया, लेकिन कूटनीतिक भाषा में दिए गए इस बयान ने भारत की विदेश नीति की गहराई और संतुलन को एक बार फिर सामने ला दिया।
यह सर्वविदित है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इजरायल के बीच रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। कृषि, रक्षा, तकनीकी सहयोग और खुफिया साझेदारी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों ने गहरा सहयोग विकसित किया है। इजरायल भारत का एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार है और कई आधुनिक हथियार प्रणालियाँ भारत को वहीं से मिलती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और इजरायली नेतृत्व के बीच भी व्यक्तिगत स्तर पर मजबूत रिश्ते रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत ने इजरायल की कार्रवाई की निंदा क्यों की?
कतर भारत के लिए सिर्फ एक पश्चिम एशियाई देश नहीं है, बल्कि वह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कतर भारत को प्राकृतिक गैस (LNG) का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। करीब 8 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी कतर में रहते और काम करते हैं। भारत-कतर के बीच व्यापार और निवेश के मजबूत संबंध हैं। दोहा पर हमला सीधे तौर पर इन रिश्तों पर असर डाल सकता था। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी को इस मामले में स्पष्ट प्रतिक्रिया देनी पड़ी।
पीएम मोदी का बयान भारत की कूटनीतिक संतुलन साधने की कला को दर्शाता है। उन्होंने इजरायल का नाम लिए बिना केवल हमले की आलोचना की। बयान का केंद्र बिंदु कतर की संप्रभुता रहा, न कि हमलावर की पहचान। इस तरह भारत ने इजरायल से अपने रिश्तों को ठेस पहुँचाए बिना कतर के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखा। यह रणनीति भारत की बहु-आयामी विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें मित्र देशों के बीच भी संतुलन बनाए रखना शामिल है।
भारत ने पिछले दशक में पश्चिम एशिया में अपनी उपस्थिति और प्रभाव को काफी बढ़ाया है। सऊदी अरब, यूएई, ईरान और कतर जैसे देशों के साथ भारत के रिश्ते ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा मामलों में गहरे हैं। वहीं, इजरायल और अमेरिका के साथ भी भारत का रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है।
ऐसे में जब कतर और इजरायल जैसे देशों के बीच तनाव पैदा होता है, तो भारत की भूमिका एक कूटनीतिक पुल के रूप में सामने आती है। पीएम मोदी का बयान इसी भूमिका को दर्शाता है।
भारत ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह रुख अपनाया है कि किसी भी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने यही रुख रखा। गाजा संघर्ष और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी भारत का यही दृष्टिकोण सामने आया।
दोहा पर हमले की निंदा करना इसी रुख की निरंतरता है। इससे भारत ने यह संदेश दिया कि वह केवल दोस्ती या रणनीतिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि सिद्धांतों और वैश्विक मूल्यों के आधार पर भी निर्णय लेता है।
कतर और इजरायल, दोनों ही भारत के लिए सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अहम हैं। कतर ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण है। इजरायल रक्षा सहयोग और तकनीकी नवाचार का अहम साझेदार है।
भारत का लक्ष्य है कि दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखें और किसी एक पक्ष की आलोचना या समर्थन से दूसरे के साथ रिश्तों पर असर न पड़े। यही वजह है कि पीएम मोदी का बयान बेहद सावधानी से तैयार किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति और संघर्षों में शांति स्थापना और मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है। भारत का वैश्विक कद और तटस्थ छवि इस दिशा में मददगार हो सकते हैं। कतर पर हमले की निंदा करना उसी प्रयास की एक कड़ी है, जिसमें भारत खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान यह साबित करता है कि भारत आज की दुनिया में केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय और जिम्मेदार खिलाड़ी है।
इजरायल से दोस्ती के बावजूद भारत ने कतर की संप्रभुता की रक्षा के पक्ष में खड़े होकर संतुलित कूटनीति का परिचय दिया। यह रुख न केवल भारत-कतर संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता और छवि को भी बढ़ाएगा। भारत की यह नीति साफ तौर पर बताती है कि वह ‘दोस्त सबके, पर नीति अपनी’ के सिद्धांत पर चल रहा है।








