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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा: अगर बिहार SIR अभ्यास में कोई गैरकानूनी पहलू पाया गया तो चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली होगी रद्द

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    बिहार विधानसभा चुनाव से पहले SIR (Special Intensive Revision) अभ्यास को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई करते हुए साफ कर दिया कि यदि चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की गैरकानूनी कार्यप्रणाली पाई गई तो पूरा अभ्यास रद्द कर दिया जाएगा। यह टिप्पणी न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में चुनावी पारदर्शिता पर बहस छेड़ सकती है।

    🔹 सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोकतंत्र की जड़ें चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर टिकी हैं। अगर मतदाता सूची संशोधन या SIR अभ्यास में अनियमितता पाई गई तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।

    🔹 क्या है SIR अभ्यास?

    SIR (Special Intensive Revision) अभ्यास चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाता है।

    • इसमें नए मतदाताओं को जोड़ा जाता है।

    • मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं।

    • डुप्लीकेट या फर्जी वोटरों की पहचान की जाती है।

    बिहार में 2025 के चुनाव से पहले यह अभ्यास बड़े पैमाने पर चलाया गया है, लेकिन विपक्ष ने इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।

    🔹 विपक्ष की आपत्ति

    राजद (RJD) और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि SIR अभ्यास का इस्तेमाल विशेष समुदाय और विपक्षी दलों के समर्थक वोटरों को सूची से हटाने के लिए किया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है और चुनाव आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है।

    🔹 चुनाव आयोग का पक्ष

    चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि SIR अभ्यास पूरी तरह से पारदर्शी और कानूनी दायरे में किया गया है।

    • सभी जिलों में बूथ स्तर पर अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।

    • हर बदलाव को सत्यापन प्रक्रिया से गुजारा गया है।

    • तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल और हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं।

    🔹 सुप्रीम कोर्ट का रुख

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की दलीलें सुनीं लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “यदि किसी मतदाता को बिना उचित प्रक्रिया के सूची से बाहर किया गया तो यह गंभीर उल्लंघन माना जाएगा।”

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए।

    🔹 लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर

    यह मामला सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस अभ्यास को रद्द करता है तो इसका असर पूरे देश की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पर पड़ेगा।

    • चुनावी पारदर्शिता को लेकर नया मापदंड तय होगा।

    • भविष्य में राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग पर उठाए जाने वाले सवालों का स्वरूप भी बदल जाएगा।

    🔹 जनता की प्रतिक्रिया

    सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से चर्चा में है। कई लोग मानते हैं कि मतदाता सूची में पारदर्शिता लाना जरूरी है, जबकि कुछ का कहना है कि विपक्ष इस मुद्दे को चुनावी राजनीति के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।

    🔹 आगे की राह

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और अगली सुनवाई में स्पष्ट कर दिया जाएगा कि SIR अभ्यास जारी रहेगा या रद्द होगा।

    बिहार चुनाव 2025 के पहले ही SIR अभ्यास विवाद का केंद्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ा दिया है। अब देखना होगा कि आगे की सुनवाई में कौन-सा फैसला लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों के हित में आता है।

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