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महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच जलगांव जिले की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच अब खुली सियासी जंग छिड़ गई है। कभी गठबंधन के साथी रहे ये दोनों दल अब एक-दूसरे पर तीखे बयानबाजी और आरोपों के जरिए जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
जलगांव, जो उत्तर महाराष्ट्र की राजनीति में रणनीतिक रूप से अहम इलाका माना जाता है, वहां पिछले कुछ हफ्तों से राजनीतिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। भाजपा की ओर से उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल में जिले में कई जनसभाएं कीं, जहां उन्होंने शिवसेना (उद्धव) और विपक्षी गठबंधन पर तीखे प्रहार किए। वहीं, दूसरी ओर शिवसेना (शिंदे गुट) ने भाजपा पर अपने स्थानीय नेताओं को तोड़ने और संगठन को कमजोर करने के आरोप लगाए हैं।
जलगांव के कई विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा और शिवसेना के बीच सीधा मुकाबला बनने के आसार हैं। खासकर भुसावल, चालीसगांव और एरंडोल जैसे इलाकों में दोनों दलों के नेता चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां की सियासत सिर्फ विकास और जनहित तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब यह वर्चस्व की लड़ाई बन चुकी है।
बीते दिनों हुए एक कार्यक्रम में शिवसेना नेता गुलाबराव पाटिल ने भाजपा पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि “बीजेपी केवल सत्ता के लिए गठबंधन करती है, जनसेवा के लिए नहीं।” वहीं, भाजपा जिलाध्यक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि “शिवसेना अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है और भाजपा के विकास कार्यों से उसे डर लग रहा है।”
इस बीच, आम जनता भी इस राजनीतिक खींचतान को करीब से देख रही है। जलगांव के किसानों और छोटे व्यापारियों का कहना है कि उन्हें सियासी रैलियों और बयानों से ज्यादा उम्मीद अब ठोस नीतियों और राहत योजनाओं से है। पानी, रोजगार और सड़कों की समस्याएं अब भी प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा इस बार जलगांव जिले की सभी सीटों पर कब्जा जमाने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि शिवसेना अपने परंपरागत मतदाताओं को वापस जोड़ने में लगी है। उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे — दोनों ही गुटों के नेता आने वाले हफ्तों में इस क्षेत्र में दौरे करने वाले हैं, जिससे माहौल और गरमाने की संभावना है।
जलगांव का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां मतदाता अक्सर स्थानीय नेतृत्व और विकास कार्यों के आधार पर वोट करते हैं। ऐसे में, दोनों दलों के बीच सीधा टकराव पार्टी स्तर से ज्यादा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। भाजपा की ओर से जलगांव नगर निगम और जिला परिषद में मजबूत पकड़ है, जबकि शिवसेना ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) भी इस सियासी परिदृश्य को ध्यान से देख रही हैं। विपक्षी गठबंधन के कुछ नेताओं का कहना है कि भाजपा और शिवसेना की यह लड़ाई विपक्ष के लिए अवसर साबित हो सकती है। हालांकि, क्षेत्रीय समीकरण और स्थानीय नेतृत्व के मुद्दे फिलहाल भाजपा-शिवसेना मुकाबले को ही केंद्र में रखे हुए हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जलगांव की राजनीति का असर पूरे उत्तर महाराष्ट्र की दिशा तय करेगा। अगर भाजपा यहां मजबूत प्रदर्शन करती है, तो इसका असर नाशिक और धुले जिलों तक जा सकता है। वहीं, शिवसेना के लिए यह क्षेत्र प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है क्योंकि यह उसके पुराने गढ़ों में से एक माना जाता है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, जलगांव की यह सियासी जंग और तेज होती जा रही है। आने वाले दिनों में रैलियों, आरोप-प्रत्यारोप और गठबंधन की रणनीतियों के साथ यह मुकाबला और दिलचस्प रूप ले सकता है। जनता की नजर इस पर टिकी है कि आखिर इस बार विकास, नेतृत्व या वादों में से कौन जीत का असली आधार बनेगा।








