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विश्व‑साहित्य के प्लेटफॉर्म पर भाषा‑विविधता का उत्सव बना — और इस बार विशेष रूप से उर्दू भाषा‑साहित्य ने अपनी मौजूदगी शानदार तरीके से दर्ज कराई है। 5 से 16 नवंबर 2025 तक आयोजित हुए 44वें Sharjah International Book Fair (SIBF) में उर्दू पुस्तकों को पाठकों से अनपेक्षित उत्साह‑सह प्रतिक्रिया मिली।
यूएई के शारजाह के Expo Centre में आयोजित इस मेले का थीम “Between You and a Book” रखा गया था। इस वर्ष का मेला 118 देशों से 2,350 से अधिक प्रकाशकों‑प्रदर्शकों को मंच दे रहा था। ऐसे में उर्दू किताबों की लोकप्रियता ने यह संदेश दिया कि यह भाषा‑साहित्य सिर्फ एक सांप्रदायिक भाषा नहीं बल्कि वैश्विक पाठकों के लिए भी खुला संवाद है।
उर्दू पुस्तक स्टॉलों के सामने लंबी कतारें बनी देखना इस बात का संकेत था कि भारत सहित अन्य देशों में उर्दू पढ़ने‑समझने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विशेष रूप से भारत से आए साहित्यप्रेमियों ने इस भाषा‑साहित्य पर अपनी रुचि और समर्थन स्पष्ट किया। जैसे‑उर्दू की कहानियाँ, गज़ल‑संग्रह, बच्चों के लिए चित्रित किताबें और ग्राफिक‑नोवेल्स ने दिलचस्पी जगी।
मेले के आयोजकों के अनुसार, इस वर्ष उर्दू भाषा के लिए विशेष सांस्कृतिक सत्र भी आयोजित किए गए थे जिसमें कविताएँ, गज़लें और संवाद सत्र शामिल थे। यह सत्र आठ भाषाओं तक फैले थे और उनमें उर्दू का स्थान विशेष था। इस तरह, उर्दू पाठ‑संस्कृति को नए बहस‑मंच मिले हैं।
भारतीय प्रकाशकीय संस्थाओं व पाठक‑समुदायों ने इस उत्सव को ऐसे देखा कि यह एक भाषा‑पार‑सेतु बन रही है; जहाँ हिंदी‑उर्दू‑अंग्रेजी के पाठक‑लेखक मिलकर बहुभाषीय संवाद कर रहे हैं। इसके परिणाम स्वरूप भारत में उर्दू किताबों की मांग और प्रकाशन‑सक्रियता भी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
विश्लेषकों ने यह देखा है कि उर्दू का यह जोर सिर्फ पुरानी पठन‑परंपरा का परिणाम नहीं है, बल्कि आधुनिक प्रारूपों जैसे डिजिटल इबुक, ग्राफिक‑नोवेल और बच्चों‑कहानियों में भी उर्दू का विस्तार हो रहा है। इस ग्रोथ से यह स्पष्ट होता है कि यह भाषा‑साहित्य नव‑पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक बन रहा है।
मेले के दौरान न केवल उर्दू किताब‑प्रदर्शन हुआ, बल्कि अनेक चर्चा‑शाखाएँ एवं कार्यशालाएँ भी आयोजित की गईं। भारत की ओर से राष्ट्रीय उर्दू भाषा‑प्रचार परिषद (NCPUL) तथा अन्य साहित्य‑संस्थाओं ने भाग लिया और उर्दू भाषा‑साहित्य को वैश्विक संदर्भ में मजबूत बनाने की दिशा में संवाद किये।
साहित्यप्रेमियों के लिए यह अनुभव भी नया था कि पुस्तक‑मेला सिर्फ किताबों का बड़ा बाजार नहीं रहा, बल्कि भाषा‑संपर्क, बातचीत तथा नए विचारों का मंच बन गया है। उर्दू किताबों की इस सफलता ने यह भी दिखाया कि भाषा‑भेद की सीमाएँ कम होती जा रही हैं और पाठक‑समूह भाषा से कहीं आगे जाकर विचार‑साझा में रुचि ले रहे हैं।
भारत‑उर्दू प्रकाशन‑मंच के लिए यह समय‑सुगम माना जा रहा है। अब उम्मीद की जा रही है कि इस तरह की प्रतिक्रिया किताब‑प्रकाशन को स्थिरता देगी, लेखक‑पाठक को और प्रेरित करेगी तथा उर्दू‑साहित्य को एक नए आदर्श‑मंच तक पहुंचाने में मदद करेगी।
शारजाह पुस्तक मेला में उर्दू की यह लोकप्रियता इस संदेश के साथ समाप्त होती है कि भाषा‑साहित्य का असर सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक‑प्रसार का भी है। जब लाखों पाठक उर्दू किताबों को चुन रहे हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि इस भाषा‑साहित्य को अब सिर्फ एक क्षेत्रीय भाषा नहीं माना जा सकता।
संक्षिप्त रूप से कहा जाए तो, 44वें Sharjah International Book Fair ने उर्दू को एक वैश्विक पुस्तक‑बाँधने वाली भाषा के रूप में पुष्ट किया है। इस आयोजन ने न सिर्फ किताबों की बिक्री बढ़ाई है बल्कि भाषा‑प्रेमियों में एक नए‑जियोश का संचार भी किया है। इस तरह, किताब‑प्यारियों के लिए यह मेला और विशेष रूप से उर्दू भाषा‑प्रेमियों के लिए यादगार बन गया है।








