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20 जनवरी 2026 को तमिलनाडु विधानसभा का सत्र शुरू होते ही एक बड़ा राजनीतिक विवाद लीक हुआ, जब राज्यपाल आर.एन. रवी (R.N. Ravi) ने सरकार की तैयार परंपरागत उद्घोषणा (customary address) पढ़ने से इनकार कर सभा से बाहर चले गए। रवी ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा तैयार किया गया भाषण नामक पाठ में कई “अनियमितताएँ और अपुष्ट दावे” शामिल हैं, इसलिए वे उसे पढ़ना उचित नहीं मानते।
राज्यपाल के कार्यालय (लोक भवन) ने एक 13-बिंदु बयान जारी कर कहा कि भाषण में अविश्वसनीय आंकड़े, भ्रामक दावे, और जनता को प्रभावित करने वाले कई गंभीर मुद्दों को अनदेखा करना शामिल है। रवी ने यह भी दावा किया कि उनका माइक्रोफोन बार-बार बंद कर दिया गया, जिससे उन्हें बोलने का मौका ही नहीं मिला।
यह घटना **राज्यपाल और **मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव का एक नया अध्याय है, और यह चतुर्थ वर्ष है जब रवी ने विधानसभा में संबोधन देने से इनकार कर वॉकआउट किया है।
मुख्यमंत्री स्टालिन ने राज्यपाल के कदम की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह संभ्रांत परंपरा और संसदीय नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पूर्व द्वारा भेजे गए टेक्स्ट के अलावा किसी भी तरह के संशोधन या वैकल्पिक विचारों को शामिल करने का अधिकार राज्यपाल को संविधान में नहीं दिया गया है, और इसे सभा का अपमान कहा।
स्टालिन ने विधानसभा में यह भी घोषणा की कि DMK सरकार संविधान में संशोधन की मांग करेगी ताकि राज्यपाल द्वारा पारंपरिक उद्घोषणा देना आवश्यक न रहे, क्योंकि कई बार यह प्रथा विवाद का कारण बनती रही है।
इस वॉकआउट के दौरान, तमिलनाडु सभा में ‘तमिल थी वाज्धू’ (राज्य का गीत) बजाया गया था, लेकिन राष्ट्रीय गान से पहले राष्ट्रीय प्रतीक सम्मान को लेकर भी मतभेद सामने आए। राजभवन ने इसे राष्ट्रगान के अपमान के रूप में देखा, जबकि सरकार ने परंपरा का बचाव किया कि तमिल गीत को पहले बजाया जाना लोक विधान में प्रचलित है।
यह विवाद तमिलनाडु की राजनीति में एक नया संवैधानिक और सांवैधानिक वादविवाद खड़ा करता दिख रहा है, जिससे राज्य और केंद्र-नियुक्त पदाधिकारियों के बीच संबंध और अधिक तनावपूर्ण बन गया है।








