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  • पीएम विश्वकर्मा योजना में जाति आधारित नामों पर उठे सवाल, संसदीय समिति ने जताई चिंता

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    केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी PM Vishwakarma Scheme को लेकर संसदीय समिति ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। समिति ने योजना में कौशल आधारित नामों को जातियों से जोड़ने के तरीके पर चिंता जताई है।

    संसदीय समिति का कहना है कि योजना में कई पारंपरिक व्यवसायों के नाम सीधे तौर पर कुछ जातियों से जुड़े माने जाते हैं, जिससे सामाजिक वर्गीकरण की भावना को बढ़ावा मिल सकता है।

    योजना का उद्देश्य

    प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना है।

    इस योजना के तहत बढ़ई, लोहार, कुम्हार, सुनार, दर्जी और अन्य पारंपरिक कारीगरों को वित्तीय सहायता और कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा सकें।

    संसदीय समिति की आपत्ति

    संसदीय समिति ने कहा कि योजना में जिन कौशलों के नाम शामिल किए गए हैं, वे कई जगहों पर विशिष्ट जातियों से जुड़े माने जाते हैं। इससे सामाजिक पहचान और पेशे के बीच संबंध को मजबूत करने का संदेश जा सकता है।

    समिति ने सुझाव दिया कि सरकार योजना के नामकरण और प्रस्तुति में सावधानी बरते ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी प्रकार का जातिगत संकेत या भेदभाव न दिखाई दे।

    सरकार से मांगी गई स्पष्टीकरण

    समिति ने सरकार से यह भी पूछा है कि योजना में शामिल कौशलों का चयन किस आधार पर किया गया और क्या इससे समाज के अन्य वर्गों पर कोई असर पड़ सकता है।

    इसके साथ ही समिति ने यह भी सुझाव दिया कि योजना को अधिक समावेशी बनाने के लिए इसमें नए कौशल और व्यवसायों को भी शामिल किया जा सकता है।

    कारीगरों को मिलेगा लाभ

    हालांकि सरकार का कहना है कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें आधुनिक बाजार से जोड़ना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर योजना को सही तरीके से लागू किया गया तो इससे लाखों कारीगरों को रोजगार और आय बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

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