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देश की राजनीति में इन दिनों एक नया विवाद तेजी से उभरकर सामने आया है, जिसमें कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा आमने-सामने आ गए हैं। यह पूरा मामला सरमा की पत्नी रिंकी भुइंया सरमा पर लगाए गए कथित ‘तीन पासपोर्ट’ के आरोपों से जुड़ा हुआ है, जिसने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है।
घटनाक्रम तब और तेज हो गया जब असम पुलिस की एक टीम दिल्ली पहुंची और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के घर पर दस्तक दी। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई सरमा की पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर की गई है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को झूठा और भ्रामक बताया है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार जब पुलिस टीम पवन खेड़ा के निवास पर पहुंची, तब वे घर पर मौजूद नहीं थे और दिल्ली से बाहर गए हुए थे।
यह विवाद कुछ दिन पहले शुरू हुआ था, जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के पास तीन अलग-अलग देशों—संयुक्त अरब अमीरात (UAE), एंटीगुआ-बारबुडा और मिस्र—के पासपोर्ट हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि इन पासपोर्ट्स की वैधता अलग-अलग वर्षों तक है, जिससे कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कांग्रेस ने इस मुद्दे को चुनावी पारदर्शिता और नैतिकता से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री से जवाब मांगा था।
इस मामले ने असम विधानसभा चुनाव 2026 के ठीक पहले राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि अगर ये दावे सही हैं, तो यह एक बड़ा संवैधानिक और कानूनी मुद्दा बन सकता है। वहीं, भाजपा और मुख्यमंत्री सरमा ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और साजिश करार दिया है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने पलटवार करते हुए कहा कि ये आरोप पूरी तरह से झूठे हैं और इन्हें बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश के तहत फैलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इन आरोपों के पीछे विदेशी, विशेषकर पाकिस्तानी सोशल मीडिया नेटवर्क की भूमिका हो सकती है। सरमा ने कहा कि उनकी पत्नी ने इस मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है और दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए मुख्यमंत्री से तीन सवाल पूछे थे, जिनमें विदेशी संपत्तियों और कंपनियों से जुड़े आरोप शामिल थे। उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री चुनाव आयोग के सामने इन सभी मुद्दों पर शपथपत्र प्रस्तुत करें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। चुनाव के ठीक पहले ऐसे मुद्दों का उछलना आम बात है, जिससे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इस मामले में कानूनी पहलू भी जुड़ गया है, जिससे इसकी गंभीरता और बढ़ गई है।
दूसरी ओर, भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की ‘निराधार राजनीति’ बता रही है और इसे चुनावी स्टंट करार दे रही है। पार्टी का कहना है कि कांग्रेस बिना ठोस सबूत के इस तरह के आरोप लगाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही है।
अब इस पूरे मामले की नजर पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पवन खेड़ा अपने आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश कर पाते हैं या फिर यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।
कुल मिलाकर, यह विवाद आने वाले दिनों में और भी तूल पकड़ सकता है, खासकर जब असम में चुनाव नजदीक हैं। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी लड़ाई एक साथ चलती रहती है, और इसका सीधा असर चुनावी माहौल पर पड़ता है।








