




रिशभ अग्रवाल और अवि वर्मा, दो प्रमुख भारतीय एआई शोधकर्ता, जिन्होंने मेटा के सुपरइंटेलिजेंस लैब में उच्च वेतन पर कार्य किया, ने अब ओपनएआई में शामिल होने के लिए मेटा को छोड़ दिया है। रिशभ अग्रवाल ने अगस्त 2025 में मेटा के सुपरइंटेलिजेंस लैब से इस्तीफा दिया, जबकि अवि वर्मा ने भी हाल ही में ओपनएआई में पुनः शामिल होने का निर्णय लिया।
रिशभ अग्रवाल, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के स्नातक, ने अपनी पीएचडी मिल्ला-क्यूबेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंस्टीट्यूट से की है। उन्होंने Waymo, Google Brain, और DeepMind जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में कार्य किया है। अगस्त 2025 में, उन्होंने मेटा के सुपरइंटेलिजेंस लैब में एक मिलियन डॉलर वार्षिक वेतन पर कार्य शुरू किया, लेकिन केवल पांच महीने बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका कहना था कि उन्होंने “विभिन्न प्रकार के जोखिम” लेने का निर्णय लिया, जो मेटा की उच्च वेतन वाली पेशकश से अलग था।
अवि वर्मा, जिन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है, पहले ओपनएआई और टेस्ला जैसी कंपनियों में कार्य कर चुके हैं। मेटा के सुपरइंटेलिजेंस लैब में शामिल होने के बाद, उन्होंने ओपनएआई में पुनः शामिल होने का निर्णय लिया। उनका कहना था कि ओपनएआई में कार्य करना उनके लिए अधिक उपयुक्त था, और उन्होंने मेटा को छोड़ने का निर्णय लिया।
मार्क जुकरबर्ग ने मेटा की सुपरइंटेलिजेंस लैब की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य एआई में सुपरइंटेलिजेंस की दिशा में शोध करना था। इस पहल के तहत, मेटा ने ओपनएआई, डीपमाइंड, और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों से शीर्ष शोधकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए उच्च वेतन की पेशकश की। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद, कई शोधकर्ताओं ने मेटा को छोड़ दिया और ओपनएआई में पुनः शामिल हो गए। विश्लेषकों का मानना है कि मेटा की संगठनात्मक संरचना और कार्य संस्कृति में अंतर के कारण यह पलायन हुआ है।
रिशभ अग्रवाल और अवि वर्मा का मेटा से ओपनएआई में जाना, एआई उद्योग में प्रतिभा की गतिशीलता और कंपनियों की कार्य संस्कृति के महत्व को दर्शाता है। यह घटनाएँ मेटा की एआई रणनीति और भर्ती नीतियों पर सवाल उठाती हैं। भविष्य में, यह देखना दिलचस्प होगा कि मेटा अपनी रणनीतियों में क्या बदलाव करता है और अन्य कंपनियाँ इस स्थिति से कैसे निपटती हैं।