भारत के सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति और राज्यपालों के अधिकारों से संबंधित मामले की सुनवाई के आठवें दिन केरल और कर्नाटक सरकार ने अपनी दलीलें पेश की। दोनों राज्यों ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल केवल नाममात्र के प्रमुख होते हैं और उनके निर्णय मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं।
सुनवाई के दौरान पांच जजों की विशेष पीठ ने राज्यों की दलीलों को सुना। केरल और कर्नाटक सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि भारतीय संविधान में राज्यपाल के अधिकार सीमित हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। उनके सभी संवैधानिक और प्रशासनिक निर्णय मंत्रिपरिषद की सलाह और निर्णयों के अनुरूप होने चाहिए।
केरल और कर्नाटक की दलीलों में यह भी बताया गया कि राज्यपाल का पद मुख्य रूप से औपचारिक और प्रतीकात्मक है। संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को राज्य सरकार के कार्यों में एक मार्गदर्शक और संवैधानिक पर्यवेक्षक के रूप में देखा है, न कि स्वतंत्र निर्णय लेने वाला अधिकारी।
केरल सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “राज्यपाल का निर्णय केवल मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होता है। यदि उन्हें अपने विचार से कोई निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाती है, तो इससे संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।” कर्नाटक सरकार ने भी इसी तर्क का समर्थन करते हुए कहा कि राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं।
यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों के संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या की जा रही है। अदालत यह स्पष्ट कर रही है कि क्या राज्यपाल को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार है या वे केवल मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करने के लिए बाध्य हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अदालत राज्यपाल के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को सीमित करती है, तो इससे केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। वहीं, राज्यपाल के अधिकारों को अधिक स्वतंत्र मानने पर राज्य और केंद्र के बीच राजनीतिक टकराव की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
केरल और कर्नाटक सरकार ने अदालत को बताया कि कई राज्यों में राज्यपाल केवल संवैधानिक औपचारिकताओं तक सीमित हैं। उनका मुख्य कार्य मंत्रिपरिषद के निर्णयों को औपचारिक रूप देना और कानून के अनुसार उसे लागू करना है। किसी भी स्थिति में राज्यपाल स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखते।
कर्नाटक की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि राज्यपाल का प्रमुख कार्य केवल “आदेश जारी करना और कानून का पालन कराना” है। इसके अलावा, वे राजनीतिक निर्णय लेने में स्वतंत्र नहीं हैं। इस तरह के तर्क संविधान की मूल भावना के अनुरूप हैं, जिसमें कहा गया है कि लोकतंत्र में कार्यपालिका का नियंत्रण निर्वाचित मंत्रिपरिषद के हाथ में होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया। अदालत ने राज्यपालों के अधिकार और उनकी सीमाओं पर चर्चा करते हुए कई सवाल उठाए। यह सुनवाई भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक प्रणाली की समझ को और मजबूत करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के संबंध तक सीमित नहीं होगा, बल्कि भविष्य में केंद्र-राज्य और राष्ट्रपति-राज्यपाल संबंधों पर भी प्रभाव डालेगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि संविधान का उद्देश्य लोकतंत्र में चुनावित सरकार को प्राथमिकता देना है, न कि प्रतीकात्मक पदों को अधिक शक्ति देना।
राज्यपाल भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण पद हैं। वे राज्य के लिए राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य सरकार के कार्यों में संवैधानिक पर्यवेक्षक की भूमिका निभाते हैं। हालांकि, यह पर्यवेक्षण स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई यह सुनिश्चित करेगी कि संवैधानिक पदों के अधिकार और सीमाएं स्पष्ट हों, जिससे राजनीतिक विवाद और सत्ता संघर्ष कम हों।








