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भारत में साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा एक अहम मामला हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचा। मशहूर लेखक और बुकर पुरस्कार विजेता सलमान रुश्दी की चर्चित और विवादित किताब ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
इस फैसले के साथ अब यह स्पष्ट हो गया है कि किताब पर भारत में कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं रहेगा। गौरतलब है कि ‘द सैटेनिक वर्सेज’ को भारत में करीब 36 साल तक बैन का सामना करना पड़ा था। पिछले साल ही दिल्ली हाई कोर्ट ने किताब से बैन हटाया था और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसके खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
किताब और विवाद का इतिहास
‘द सैटेनिक वर्सेज’ पहली बार साल 1988 में प्रकाशित हुई थी। इसके प्रकाशित होते ही दुनियाभर में इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया। कई मुस्लिम संगठनों ने इसे अपने धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला करार दिया। इसी विरोध के चलते भारत उन पहले देशों में से एक था जिसने इस किताब पर प्रतिबंध लगाया।
भारत सरकार ने 1988 में ‘इंपोर्ट्स एंड एक्सपोर्ट्स (कंट्रोल) एक्ट’ के तहत इस किताब की बिक्री और प्रसार पर रोक लगा दी थी। इसके बाद सालों तक यह किताब आम जनता की पहुंच से बाहर रही। हालांकि विदेशों में यह किताब बिकती और पढ़ी जाती रही, लेकिन भारत में यह निषिद्ध रही।
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला
2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए किताब पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। कोर्ट ने कहा था कि किसी भी साहित्यिक कृति पर अनिश्चितकाल तक बैन लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि समय के साथ समाज परिपक्व होता है और पुराने विवादों की प्रासंगिकता बदल जाती है। इसलिए एक किताब को केवल धार्मिक आपत्तियों के आधार पर स्थायी रूप से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि यह किताब अब भी धार्मिक भावनाओं को आहत करती है और इससे समाज में तनाव फैल सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में साहित्य और विचारों पर स्थायी रोक लगाने की परंपरा नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि किसी किताब या लेखन को पढ़ने का निर्णय पाठकों पर छोड़ देना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति असहमत है, तो वह किताब न पढ़े, लेकिन पूरे समाज पर प्रतिबंध थोपना उचित नहीं है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़ा संदेश
यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। भारत में अक्सर साहित्य, फिल्म और कला से जुड़े मामलों में धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर प्रतिबंध लगाने की मांग होती रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बहस को एक नई दिशा देता है।
कोर्ट ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश भी दिया कि समय के साथ समाज में अभिव्यक्ति के प्रति सहिष्णुता बढ़नी चाहिए। साहित्य और कला को धार्मिक और राजनीतिक चश्मे से देखने की बजाय उन्हें विचार और बहस का हिस्सा मानना जरूरी है।
सलमान रुश्दी और उनका योगदान
सलमान रुश्दी भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक हैं। वे अपने लेखन के जरिए पश्चिम और पूरब की सांस्कृतिक परंपराओं को जोड़ने और आधुनिकता व परंपरा के बीच संवाद स्थापित करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी कई किताबें, जैसे मिडनाइट्स चिल्ड्रन, शेम और द मूर्स लास्ट साई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना पाई है।
‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ के लिए उन्हें 1981 में बुकर पुरस्कार मिला था। वहीं ‘द सैटेनिक वर्सेज’ ने उन्हें वैश्विक स्तर पर विवादों के केंद्र में ला दिया। किताब पर बैन के बावजूद रुश्दी का साहित्यिक कद लगातार बढ़ता रहा।
समाज और साहित्य के बीच संतुलन
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि धार्मिक भावनाओं और साहित्यिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विचार को दबाने की बजाय उसका जवाब बहस और संवाद से दिया जाना चाहिए। प्रतिबंध समाज को और ज्यादा असहिष्णु बनाते हैं, जबकि खुली चर्चा लोकतंत्र को मजबूत करती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में अन्य विवादित साहित्यिक और कलात्मक कृतियों के लिए एक नजीर साबित हो सकता है। यह फैसला कलाकारों और लेखकों को अधिक स्वतंत्रता देगा, साथ ही पाठकों को भी यह तय करने का अधिकार देगा कि वे क्या पढ़ना या देखना चाहते हैं।
सलमान रुश्दी की ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारतीय न्यायपालिका की परिपक्वता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। 36 साल तक प्रतिबंध झेलने के बाद अब यह किताब भारत में भी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध होगी।








