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दिल्ली के लाल किला धमाका मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसने जांच एजेंसियों की चिंता को पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दिया है। इस केस में अब एक नए विस्फोटक TATP का नाम सामने आया है, जिसे दुनिया के सबसे संवेदनशील और खतरनाक विस्फोटकों में से एक माना जाता है। इसकी खतरनाक प्रकृति के कारण इसे ‘शैतान की मां’ या ‘चुड़ैल’ जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस विस्फोटक का पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों द्वारा उपयोग किए जाने की बात भी सामने आ रही है, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए और भी अधिक गंभीर चिंता का विषय है।
पहले इस धमाके में अमोनियम नाइट्रेट के इस्तेमाल की बात कही जा रही थी, जो स्वयं में एक घातक और विनाशकारी विस्फोटक है। लेकिन अब TATP का नाम आने से यह साफ हो गया है कि इस हमले की साजिश और तकनीक पहले की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल और खतरनाक थी। विशेषज्ञों का कहना है कि TATP का इस्तेमाल करना और उसे तैयार करना बेहद जोखिम भरा होता है, फिर भी कई आतंकी संगठन इसका उपयोग इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध रसायनों से तैयार किया जा सकता है और धातु-रहित होने के कारण मेटल डिटेक्टर से पकड़ में नहीं आता।
क्या है TATP? क्यों है इतना खतरनाक?
वेबसाइट Science Direct में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, TATP का पूरा नाम ट्राई-एसीटोन ट्राई-पेरॉक्साइड (Triacetone Triperoxide) है। यह एक क्रिस्टलीय कार्बनिक पेरॉक्साइड होता है, जो एसीटोन, हाइड्रोजन पेरॉक्साइड और एक एसिड की मौजूदगी में रासायनिक प्रतिक्रिया से बनता है। इस प्रतिक्रिया के बाद जो कंपाउंड बनता है वह सफेद क्रिस्टल या पाउडर जैसा दिखाई देता है, लेकिन उसकी संवेदनशीलता इतनी अधिक होती है कि हल्का सा घर्षण, गर्मी या हलचल भी इसे विस्फोट करवा सकती है।
इसी अत्यधिक संवेदनशीलता की वजह से इसे दुनिया के सबसे खतरनाक विस्फोटकों में गिना जाता है। यह हल्का भी होता है, जिससे इसे ले जाना और छिपाना आसान हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी अस्थिर प्रकृति के कारण इसे बनाने वाला व्यक्ति भी अपनी जान जोखिम में डाल देता है। यही वजह है कि इसे ‘शैतान की मां’ कहकर संबोधित किया जाता है।
आतंकी संगठनों की पहली पसंद क्यों बनता जा रहा है TATP
TATP का इस्तेमाल दुनिया भर के कई आतंकी हमलों में किया गया है। इसकी मुख्य वजह है कि इसके लिए जरूरी रसायन आमतौर पर बाजारों में उपलब्ध होते हैं और इसके घटक सामान्य रसायनों की तरह दिखाई देते हैं। धातु-रहित होने के कारण यह सुरक्षा जांच में पकड़ में नहीं आता, और इसकी विस्फोटक क्षमता किसी भी बड़े विस्फोट को अंजाम देने के लिए पर्याप्त होती है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि TATP का इस्तेमाल करने वाले आतंकी संगठन अधिक प्रशिक्षित और संसाधनयुक्त होते हैं। इसके निर्माण के लिए रसायन विज्ञान की समझ जरूरी है, इसलिए इसका उपयोग दर्शाता है कि इस ब्लास्ट के पीछे गहरी साजिश और विशेषज्ञता शामिल है।
दिल्ली लालकिला धमाका केस पर छाया नया साया
लालकिला ब्लास्ट केस में TATP का नाम सामने आने के बाद से सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी जांच की दिशा को और व्यापक कर दिया है। अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यह विस्फोटक कहां और कैसे तैयार किया गया, कौन लोग इसके पीछे थे और क्या इसके तार किसी बड़े नेटवर्क या सीमा पार से जुड़े हुए हैं।
जांच में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि “TATP का इस्तेमाल इस बात का संकेत है कि आतंकियों की मंशा सिर्फ एक धमाका करने की नहीं थी, बल्कि वे बड़े पैमाने पर विनाश की योजना बना रहे थे।” अब अगला चरण यह पता लगाना है कि इसका संभावित सप्लाई चैन क्या है और क्या दिल्ली या अन्य शहरों में भी इसके जखीरे मौजूद हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चुनौती
TATP का नाम सामने आने के बाद दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा और खुफिया निगरानी को और मजबूत किया गया है। यह विस्फोटक न केवल बनाया जाना मुश्किल है, बल्कि इसकी पहचान और ढूंढ निकालना भी बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। जांच एजेंसियों ने इसके संभावित स्रोतों और सप्लाई चैन पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया है।
इस घटना ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया है कि आतंकी संगठन लगातार अपनी रणनीति और तकनीक बदल रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को भी अपने तरीकों को लगातार अपडेट करना पड़ रहा है।








