महाराष्ट्र में सियासत एक बार फिर करवट लेती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की भारतीय जनता पार्टी से कथित नाराजगी ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। महायुति सरकार के भीतर उभरे इस तनाव पर अब विपक्ष ने हमला बोलना शुरू कर दिया है। कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट ने तीखे बयान देते हुए शिंदे पर तंज कसने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी द्वारा अन्य दलों के नेताओं को अपने पाले में शामिल किए जाने से शिंदे नाखुश हैं, जिसके बाद से सहयोगियों के बीच मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं।
इसी बीच शिवसेना (यूबीटी) के नेता आनंद दुबे ने शिंदे पर सीधा तंज कसते हुए कहा कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। दुबे ने आरोप लगाया कि शिंदे गुट ने कुछ वर्ष पूर्व बीजेपी के साथ मिलकर शिवसेना को तोड़ने की साजिश रची थी और पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि वही लोग खुद उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। आनंद दुबे के अनुसार, शिंदे गुट जिन ताकतों पर भरोसा करके सत्ता में आया था, वही अब उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल रही हैं।
दुबे ने कैबिनेट बैठक का उल्लेख करते हुए कहा कि बुधवार को हुई बैठक में शिंदे गुट के कई नेता अनुपस्थित रहे, जो सरकार के भीतर बढ़ती फूट की साफ तस्वीर दिखाता है। उन्होंने दावा किया कि अब सरकार के भीतर कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है और नेताओं का गायब रहना संकेत देता है कि आंतरिक मतभेद गहरे हो चुके हैं। उनकी मानें तो आने वाले दिनों में यह विभाजन और स्पष्ट रूप से सामने आ सकता है।
इधर कांग्रेस ने भी एकनाथ शिंदे पर हमला करने में देर नहीं की। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि शिंदे अब महायुति में अलग-थलग पड़ गए हैं। सपकाल के अनुसार, बीजेपी की रणनीति स्पष्ट है—वह सहयोगी दलों को तब तक साथ रखती है, जब तक सत्ता का गणित उसके पक्ष में रहता है। उनका कहना है कि आज शिंदे जिस स्थिति का सामना कर रहे हैं, वह उसी राजनीति का परिणाम है, जिसे उन्होंने खुद कभी बढ़ावा दिया था। सपकाल ने यह भी कहा कि शिंदे गुट में इस समय भ्रम और असुरक्षा की स्थिति है, क्योंकि कई नेता भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिंदे-बीजेपी समीकरण में उभरी यह दरार महायुति सरकार के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। हालांकि दोनों पक्षों ने सार्वजनिक रूप से कुछ भी स्वीकार नहीं किया है, लेकिन हालिया घटनाओं और नेताओं की गतिविधियों से स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि गठबंधन के भीतर खींचतान चरम पर है। शिंदे गुट के कुछ नेताओं का दावा है कि बीजेपी लगातार उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रही है और अपने विस्तार के लिए शिवसेना के नेताओं को शामिल कर रही है, जिससे उनका आधार कमजोर पड़ रहा है।
राज्य में होने वाले आगामी स्थानीय निकाय चुनाव भी इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनावी तैयारी के दौरान टिकट वितरण और नेतृत्व के मुद्दे पर भी दोनों दलों में असहमति बढ़ी है। यही कारण है कि एकनाथ शिंदे का असंतोष बढ़ता जा रहा है और इसका राजनैतिक असर धीरे-धीरे सतह पर आता दिखाई दे रहा है।
महाराष्ट्र की राजनीति में यह घटना उस नए मोड़ का संकेत है जहां सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिरता पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष इसे राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है और शिंदे की नाराजगी को हथियार बनाकर बीजेपी पर हमला कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिंदे-बीजेपी के बीच यह खींचतान सुलझती है या राज्य की राजनीति में कोई बड़ा राजनीतिक फेरबदल सामने आता है।








