भारत-चीन युद्ध 1962 के सबसे वीरता भरे अध्यायों में से एक है लद्दाख की बर्फीली ऊंचाइयों पर लड़ा गया रेजांग ला का युद्ध। इस ऐतिहासिक लड़ाई में कुमाऊं रेजिमेंट की 13 कुमाऊं की सी कंपनी ने लगभग असंभव परिस्थितियों में चीन की विशाल सेना से मुकाबला किया था। 124 जवानों में से 114 शहीद हो गए थे, जबकि गिने-चुने सैनिक ही जीवित लौट पाए। इन्हीं बहादुर योद्धाओं में से एक बचे सैनिक ने वर्षों बाद अपने अनुभव साझा किए। उनका कहना है कि जब वह आंखें बंद करते हैं, तो आज भी युद्ध का पूरा दृश्य उनके सामने जीवंत हो उठता है—चीखें, गोलियों की आवाज, बर्फीली हवा, खून से सनी धरती और अंतिम सांस तक लड़े उनके साथी।
सैनिक ने बताया कि 18 नवंबर 1962 की सुबह जैसे-जैसे चीन की सेना ने चारों दिशाओं से बढ़ना शुरू किया, वे समझ गए कि यह सिर्फ एक युद्ध नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई होने वाली है। मौसम बेहद क्रूर था। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे था और तेज बर्फीली हवा चेहरा काट रही थी। लेकिन भारतीय सैनिकों का मनोबल इससे तनिक भी नहीं डिगा। ऊंचाई पर स्थित चौकी से उन्हें साफ दिख रहा था कि दुश्मन संख्या में अनगिनत है। फिर भी सी कंपनी के जवान पीछे हटने को तैयार नहीं थे। अपने हथियारों और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने तय किया था कि अंतिम गोली और अंतिम सांस तक लड़ना है।
सैनिक याद करते हैं कि पहले हमले में चीनी सेना बेहद आक्रामक थी। गोलियों की बौछार और भारी मोर्टार फायर के बीच भारतीय सैनिकों ने अपने मोर्चे को नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि उनके साथी वीरों ने एक-एक इंच जमीन के लिए पूरी ताकत झोंक दी। मरणासन्न तापमान और ऑक्सीजन की कमी के बावजूद उनके हौसले में कोई कमी नहीं थी। उन्होंने बताया कि युद्ध के बीच कई बार ऐसा लगा कि शायद यह आखिरी पल है, लेकिन साथियों का जज़्बा देखकर वे सभी फिर खड़े हो जाते थे।
उन्होंने भावुक होकर बताया कि उनके कई साथी बिना कुछ कहे उनके सामने गिर गए, कुछ की आखिरी सांसें उनकी गोद में थीं। ठंड इतनी कड़ाके की थी कि घायल जवानों के शरीर पलों में सख्त होने लगते थे। लेकिन कोई भी पीछे नहीं हटा। उन्हें गर्व के साथ याद है कि किसी भी सैनिक ने आत्मसमर्पण नहीं किया। रेजांग ला का युद्ध भारतीय सेना की बहादुरी का प्रतीक इसलिए माना जाता है क्योंकि इस लड़ाई में संख्या, हथियार, मौसम—हर मोर्चे पर भारतीय सैनिकों को अत्यधिक नुकसान था, फिर भी उन्होंने दुश्मन को भारी क्षति पहुंचाई।
सैनिक का कहना है कि जब वह रात में सोने जाते हैं, तो अक्सर वह युद्ध की आवाजें सुनाई देती हैं। जैसे गोलियों की आवाज, साथियों का नाम पुकारना, और मोर्चे के टूटने से पहले का अंतिम पल। उन्होंने कहा कि सेना छोड़ने के बाद भी वह शांति से नहीं बैठ सके, क्योंकि युद्ध की यादें उनके दिल और दिमाग में हमेशा ताजा रहीं। वह बताते हैं कि आज भी जब वह पहाड़ों की ओर देखते हैं या ठंडी हवा चेहरे पर लगती है, तो रेजांग ला की बर्फीली ढलानें और अपने शहीद साथियों की यादें उन्हें घेर लेती हैं।
उन्होंने कहा कि आजादी के कई दशक बाद भी उस युद्ध में शामिल सैनिकों को असल पहचान और सम्मान के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। हालांकि अब रेजांग ला मेमोरियल का विस्तार किया जा चुका है और हर साल सेना के जवान वहां श्रद्धांजलि देते हैं। यह देखकर उनके मन को संतोष मिलता है कि आज की पीढ़ी उन सैनिकों की वीरता को याद करती है जिन्होंने देश की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
उन्होंने यह भी बताया कि नई पीढ़ी के सैनिकों को देखकर उन्हें गर्व होता है कि भारतीय सेना का जज़्बा आज भी वैसा ही है जैसा 1962 में था। उनका कहना है कि देश का हर नागरिक अगर यह समझ जाए कि सेना क्या-क्या त्याग करती है, तो देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना और गहरी हो जाएगी।
सैनिक ने अंत में कहा कि रेजांग ला केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि यह भारतीय साहस, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल था। उनके शब्दों में—”वह दिन भले ही बीत गया हो, लेकिन वह जंग मेरी आत्मा में बस चुकी है। जब मैं आंखें बंद करता हूं, आज भी सबकुछ वैसे ही दिखता है, जैसे उस दिन देखा था।”








