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भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में इस वर्ष यूरोप की दो शीर्ष हस्तियाँ मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मौजूदगी केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका केंद्र बिंदु होगा — भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA)।
राजकीय भोज और गणतंत्र दिवस की भव्य परेड के साथ-साथ दोनों नेताओं के एजेंडे में सबसे अहम मुद्दा भारत के साथ लंबे समय से लंबित व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ाना है। यह पहल ऐसे समय पर हो रही है जब यूरोप एक चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल से गुजर रहा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ व्यापार युद्ध को तेज़ करने की धमकी दी थी, हालांकि बाद में उन्होंने रुख नरम कर लिया।
भारत द्वारा यूरोपीय नेतृत्व को गणतंत्र दिवस के लिए आमंत्रित करना एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी देता है। यह संकेत है कि भारत वैश्विक स्तर पर अपने रणनीतिक और व्यापारिक संबंधों का तेजी से विस्तार कर रहा है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ को लेकर वॉशिंगटन के साथ गतिरोध नए वर्ष तक खिंच गया है।
लंदन स्थित चैथम हाउस थिंक-टैंक के विश्लेषक चिएतिज बजपई के अनुसार, यह कदम दर्शाता है कि भारत एक विविध विदेश नीति अपना रहा है और वह किसी एक देश या प्रशासन के दबाव तक सीमित नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता 27 जनवरी को होने वाले उच्च-स्तरीय शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित किया जा सकता है। उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दोनों ही इस समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कह चुके हैं, जो इसके रणनीतिक और आर्थिक महत्व को रेखांकित करता है।
लगभग दो दशकों की कठिन वार्ताओं के बाद यह समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यदि यह लागू होता है, तो यह भारत का पिछले चार वर्षों में नौवां मुक्त व्यापार समझौता होगा। इससे पहले भारत ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और अन्य देशों के साथ इसी तरह के करार कर चुका है।
यूरोपीय संघ के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में ब्रसेल्स ने मर्कोसुर ट्रेड ब्लॉक, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम के साथ व्यापार समझौते किए हैं, और अब भारत के साथ यह करार उसकी एशिया रणनीति को और मजबूत करेगा।
इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की वरिष्ठ विश्लेषक सुमेधा दासगुप्ता के अनुसार, मौजूदा वैश्विक हालात में भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही विश्वसनीय व्यापारिक साझेदारों की तलाश में हैं। भारत जहां अमेरिकी टैरिफ दबाव से संतुलन बनाना चाहता है, वहीं यूरोप चीन पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की उस छवि को भी बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, जिसे लंबे समय से संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता रहा है।








