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भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में एक साल तक चले केंद्रीय शासन के बाद आखिरकार नई निर्वाचित सरकार ने कामकाज संभाल लिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। लेकिन उनके सामने प्रशासनिक जिम्मेदारियों से कहीं बड़ी चुनौती है — जातीय हिंसा से टूटे राज्य में भरोसा और शांति बहाल करना।
2023 में शुरू हुई मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच हिंसा में 260 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोग अपने घरों से बेघर हो गए। हालात इतने बिगड़े कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। आज भी दोनों समुदाय बड़े पैमाने पर अलग-अलग क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं।
मार्शल आर्ट से राजनीति तक का सफर
62 वर्षीय खेमचंद सिंह केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि कोरियाई मार्शल आर्ट ताइक्वांडो में पाँचवें डैन के ब्लैक बेल्ट भी हैं। वर्षों तक उन्होंने ताइक्वांडो सिखाया और खेल संस्कृति से गहराई से जुड़े रहे।
हालाँकि उनका राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत देर से शुरू हुआ, लेकिन वे RSS से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। 2017 में पहली बार विधायक बने सिंह विधानसभा अध्यक्ष और बाद में शिक्षा व ग्रामीण विकास जैसे अहम विभागों के मंत्री भी रह चुके हैं।
शपथ के साथ ही बढ़ा तनाव
मुख्यमंत्री पद संभालने के बावजूद राज्य में हालात अभी भी बेहद नाज़ुक हैं।
21 जनवरी को कुकी-जो बहुल इलाके में एक मैतेई व्यक्ति की हत्या ने तनाव को और बढ़ा दिया। वहीं 4 फरवरी को शपथ ग्रहण के कुछ ही घंटों बाद चुराचांदपुर जिले में विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम और बाज़ार बंद देखने को मिले।
कुकी-जो संगठनों ने सरकार गठन में शामिल कुछ कुकी-जो विधायकों पर “विश्वासघात” का आरोप लगाया और अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग दोहराई।
संतुलन की कोशिश, लेकिन संदेह कायम
नई सरकार में जातीय संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। सिंह खुद मैतेई समुदाय से हैं, जबकि उनके मंत्रिमंडल में तीन कुकी-जो मंत्री, जिनमें एक उपमुख्यमंत्री भी शामिल है।
इसके बावजूद कुकी-जो समुदाय के कई नेता आश्वस्त नहीं हैं। छात्र नेताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल सत्ता परिवर्तन से शांति नहीं आएगी — इसके लिए न्याय, भरोसा और स्पष्ट राजनीतिक समाधान ज़रूरी है।
समर्थन और विरोध — दोनों सुर
राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय बुद्धिजीवियों की राय बंटी हुई है।
कुछ का मानना है कि खेमचंद सिंह की अलग-अलग समुदायों के नेताओं से कार्य संबंध उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वहीं आलोचकों का कहना है कि अब तक संघर्ष के समाधान के लिए कोई ठोस रोडमैप सामने नहीं आया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में सक्रिय सशस्त्र समूहों का निरस्त्रीकरण, संवाद प्रक्रिया और कानून का सख्त पालन ही स्थायी शांति की राह खोल सकता है।
आगे की राह
लगभग 30 लाख की आबादी वाला मणिपुर लंबे समय से उग्रवाद और अशांति का सामना करता रहा है। हालिया हिंसा ने समाज में गहरे अविश्वास की खाई बना दी है।
अब सवाल यह नहीं है कि सरकार बनी या नहीं —
असल सवाल यह है कि क्या नई सरकार प्रशासन से आगे बढ़कर भरोसे का पुनर्निर्माण कर पाएगी?
आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि युमनाम खेमचंद सिंह मणिपुर के लिए सिर्फ एक मुख्यमंत्री साबित होते हैं, या सच में शांति की उम्मीद बन पाते हैं।








