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वैज्ञानिकों ने पहली बार प्रयोगशाला में ब्रह्मांडीय धूल (cosmic dust) बनाने का ऐतिहासिक प्रयोग सफलतापूर्वक किया है, जो यह समझने में मदद करेगा कि ब्रह्मांड में अणु कैसे बनते हैं — और ज़िन्दगी के आरंभिक रसायन कैसे उत्पन्न हो सकते हैं। यह सफलता ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी के शोधकर्ताओं द्वारा हासिल की गयी है।
कॉस्मिक डस्ट मूलतः छोटे‑छोटे धूल कण होते हैं जो तारे, उल्कापिंडों और आकाशगंगा के बीच तैरते हैं। ये कण ग्रहों के निर्माण और संभवतः जीवन की रसायनिक आधारशिला में अहम् भूमिका निभाते हैं। लेकिन अब तक इन कणों को सीधे अंतरिक्ष से पृथ्वी पर लाकर अध्ययन करना मुश्किल रहा है, क्योंकि मिट्टी‑वायुमंडलीय प्रदूषण से असल संरचना बदल जाती है।
लैब में ब्रह्मांडीय धूल बनाना कैसे संभव हुआ?
शोध टीम ने उच्च वोल्टेज और चयनित गैसों का उपयोग कर अंतरिक्ष में मौजूद कठोर परिस्थितियों का अनुकरण किया।
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उन्होंने ऐसे गैस मिश्रण (जैसे नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और एसीटिलीन) को 10,000 वोल्ट की ऊर्जा में रखा,
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इससे प्लाज्मा प्रभाव उत्पन्न हुआ और काम्प्लेक्स रसायनात्मक कण बनने लगे,
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अंत में ये कण सिलीकोन जैसे सतहों पर एक सूक्ष्म धूल की परत के रूप में जमा हो गए।
इन लैब‑निर्मित कणों की संरचना वास्तविक अंतरतारकीय धूल से काफी मिलती‑जुलती पाई गयी, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रयोग अंतरिक्षीय प्रक्रियाओं का सही अनुकरण करता है।
इसका मतलब क्या है?
वैज्ञानिकों के लिए यह सफलता इसलिए मायने रखती है क्योंकि अब वे नियंत्रित परिस्थितियों में यह अध्ययन कर सकते हैं कि कैसे सरल अणु धीरे‑धीरे जटिल जैविक रसायनों में बदलते हैं — जो जीवन की शुरुआत में आवश्यक होते हैं। इसके लिए अब वे सीधे अंतरिक्ष मिशनों या उल्कापिंडों को लिए गए नमूनों पर निर्भर नहीं रहेंगे।
इस शोध से यह भी पता चल सकता है कि संरचना में बदलाव, तापमान, और ऊर्जा‑बमबारी जैसे प्रभाव अंतरतारकीय कणों को कैसे प्रभावित करते हैं, और किस तरह से इससे जटिल कार्बनिक अणु — जो जीवन के लिए जरूरी होते हैं — बनते हैं।
आगे की दिशा
शोध की अगली दिशा यह है कि लैब‑निर्मित धूल के इन्फ्रारेड संकेतों (infrared signatures) का डेटाबेस बनाया जाये ताकि खगोलशास्त्री टेलीस्कोप डेटा से सीधे यह पहचान सकें कि ब्रह्मांड के किन हिस्सों में जटिल रसायनात्मक प्रक्रियाएँ हो रही हैं। इससे तारों के जन्म स्थानों, मृत तारों की अवशिष्ट झीलों और उल्कापिंडों में होने वाली रसायनिक प्रक्रियाओं को बेहतर समझा जा सकेगा।








