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  • असम चुनाव से दूरी बनाए क्यों हैं असदुद्दीन ओवैसी? AIMIM की रणनीति को लेकर बढ़ी राजनीतिक चर्चा

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    असम में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सभी प्रमुख दल चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं, लेकिन इस बीच एक नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है—Asaduddin Owaisi। आमतौर पर देश के कई राज्यों में चुनाव लड़ने की आक्रामक रणनीति अपनाने वाले ओवैसी इस बार असम को लेकर अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रहे हैं।

    बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अपनी पार्टी के विस्तार की कोशिश करने वाले ओवैसी ने अब तक असम चुनाव को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। न तो उन्होंने चुनाव लड़ने की घोषणा की है और न ही किसी गठबंधन की संभावना पर खुलकर बात की है। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में उनकी रणनीति को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    असम की राजनीति पर ओवैसी समय-समय पर बयान जरूर देते रहे हैं। वे अक्सर राज्य के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की नीतियों की आलोचना करते हैं और आरोप लगाते हैं कि राज्य में सांप्रदायिक माहौल बनाया जा रहा है।

    ओवैसी का कहना रहा है कि असम में मुसलमानों के साथ अन्याय हो रहा है और सरकार की नीतियां संविधान की भावना के खिलाफ हैं। हालांकि इन राजनीतिक आरोपों के बावजूद उन्होंने अब तक असम में अपनी पार्टी को चुनावी मैदान में उतारने को लेकर ठोस कदम नहीं उठाया है।

    असम में विधानसभा चुनाव की घोषणा में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। राज्य के राजनीतिक दल महीनों पहले से ही चुनावी तैयारियों में जुटे हुए हैं। लेकिन AIMIM की ओर से अभी तक यह साफ नहीं किया गया है कि पार्टी चुनाव लड़ेगी या नहीं।

    यह भी स्पष्ट नहीं है कि अगर पार्टी चुनाव नहीं लड़ती है तो वह किस राजनीतिक दल का समर्थन करेगी। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे AIMIM की रणनीतिक चुप्पी मान रहे हैं।

    कुछ समय पहले यह चर्चा भी तेज हुई थी कि ओवैसी की पार्टी AIMIM और All India United Democratic Front के बीच चुनावी गठबंधन हो सकता है। AIUDF के नेता Badruddin Ajmal ने नवंबर 2025 में संकेत दिया था कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत चल रही है और भविष्य में साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    उन्होंने ओवैसी को अपना ‘भाई’ बताते हुए कहा था कि दोनों नेता मिलकर प्रचार भी कर सकते हैं। इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि असम चुनाव में मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कोशिश की जा सकती है।

    हालांकि इन अटकलों के कुछ ही समय बाद AIMIM ने आधिकारिक रूप से स्पष्ट कर दिया कि पार्टी ने असम में चुनावी अभियान शुरू करने या किसी भी दल के साथ गठबंधन करने का कोई फैसला नहीं लिया है।

    पार्टी के इस बयान के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया कि फिलहाल AIMIM असम की राजनीति में सक्रिय रूप से उतरने की योजना नहीं बना रही है।

    असम की राजनीति में AIUDF पहले से ही एक मजबूत राजनीतिक ताकत मानी जाती है। यह पार्टी खासकर बांग्ला भाषी मुसलमानों के बीच काफी प्रभाव रखती है और पिछले कई चुनावों में उसने अच्छा प्रदर्शन किया है।

    2006 के विधानसभा चुनाव में AIUDF ने 10 सीटें जीती थीं, जबकि 2011 में उसे 18 सीटों पर सफलता मिली थी। 2016 में पार्टी को 13 सीटें मिलीं और 2021 के चुनाव में उसने 16 सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी मजबूत बनाए रखी।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम में पहले से मौजूद एक मजबूत मुस्लिम नेतृत्व के कारण ओवैसी के लिए यहां राजनीतिक जमीन बनाना आसान नहीं है।

    ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे विपक्षी वोटों को बांटने का काम करती हैं। कई राजनीतिक दल उन्हें ‘वोट कटवा पार्टी’ तक कहते हैं।

    यदि AIMIM असम में चुनाव लड़ती है तो इस तरह के आरोप और तेज हो सकते हैं। संभव है कि इसी कारण ओवैसी फिलहाल इस राज्य में खुलकर चुनावी मैदान में उतरने से बच रहे हों।

    असम को लेकर ओवैसी की राजनीतिक सक्रियता फिलहाल ज्यादातर सोशल मीडिया तक सीमित दिखाई देती है। वे राज्य के मुद्दों पर बयान जरूर देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय करने या चुनावी दौरे करने जैसे कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं।

    अप्रैल में संभावित चुनावों के बावजूद उनकी यह दूरी कई राजनीतिक सवाल खड़े कर रही है।

    असम विधानसभा चुनाव से पहले AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की रणनीतिक चुप्पी राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है।

    एक ओर असम में बड़ी मुस्लिम आबादी है, वहीं दूसरी ओर AIUDF जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टी पहले से मौजूद है। ऐसे में ओवैसी के सामने राजनीतिक समीकरणों को साधने की चुनौती भी है।

    आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या AIMIM अचानक चुनावी मैदान में उतरती है या फिर ओवैसी असम की राजनीति से दूरी बनाए रखते हुए किसी अन्य रणनीति के तहत आगे बढ़ते हैं।

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