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  • ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच भारत बना सहारा! बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका ने मांगी तेल-गैस मदद

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    ईरान और अमेरिका-इज़राइल के बीच बढ़ते युद्ध के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पड़ा है, जो वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का प्रमुख मार्ग माना जाता है। इस मार्ग से दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल की सप्लाई होती है। लेकिन मौजूदा तनाव के चलते यहां से तेल की आवाजाही लगभग बाधित हो गई है, जिसका असर सीधे तौर पर दक्षिण एशिया के देशों पर दिखने लगा है।

    इसी संकट के बीच भारत के पड़ोसी देश—बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका—ने भारत से तेल और गैस की आपूर्ति के लिए मदद मांगी है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि इन देशों की मांगों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

    दरअसल, ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कई जगहों पर हमलों और सुरक्षा खतरों के कारण तेल टैंकरों का संचालन मुश्किल हो गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई घट गई और कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला।

    इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ा है जो ऊर्जा के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं। खासकर दक्षिण एशिया के छोटे देशों के पास पर्याप्त भंडारण या वैकल्पिक स्रोत नहीं होने के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है।

    बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक आयातित ईंधन पर निर्भर है। जैसे ही वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई, इन देशों में ईंधन की कमी और कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली।

    • बांग्लादेश ने भारत से विशेष रूप से डीजल की आपूर्ति की मांग की है।
    • मालदीव ने भी बढ़ती कीमतों और सीमित भंडारण के चलते भारत से तेल सहायता मांगी है।
    • श्रीलंका, जो पहले से आर्थिक संकट से जूझ रहा है, उसे भी ऊर्जा आपूर्ति में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

    कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, श्रीलंका को हालात संभालने के लिए ईंधन राशनिंग और काम के दिनों में कटौती जैसे कदम उठाने पड़े हैं।

    भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और खुद भी बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है। ऐसे में अपने पड़ोसी देशों की मदद करना एक बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक निर्णय है।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत इन मांगों पर फैसला लेते समय अपनी घरेलू जरूरतों और उत्पादन क्षमता को प्राथमिकता देगा।
    सरकार का साफ कहना है कि पहले देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, उसके बाद ही निर्यात या सहायता पर निर्णय लिया जाएगा।

    होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसके जरिए सऊदी अरब, ईरान, कुवैत, इराक और यूएई जैसे देशों का तेल दुनिया भर में पहुंचता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, तो पूरी दुनिया में तेल संकट और महंगाई बढ़ सकती है। भारत समेत कई एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा इसी मार्ग पर निर्भर करती है।

    हालांकि भारत ने अभी तक स्थिति को नियंत्रित रखा है, लेकिन इसके असर साफ दिखने लगे हैं:

    • LPG और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है
    • तेल की कीमतों में तेजी आई है
    • कई उद्योगों और सेवाओं पर दबाव बढ़ा है

    सरकार वैकल्पिक स्रोतों जैसे रूस से तेल आयात और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी काम कर रही है।

    इस संकट के बीच भारत की भूमिका बेहद अहम हो गई है। एक तरफ भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित करना है, वहीं दूसरी ओर अपने पड़ोसी देशों की मदद करके क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना भी जरूरी है।

    हाल ही में भारत ने श्रीलंका को ईंधन की आपूर्ति करके यह दिखाया है कि वह संकट के समय अपने पड़ोसियों के साथ खड़ा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान-अमेरिका संघर्ष लंबा खिंचता है, तो दक्षिण एशिया में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। ऐसे में भारत को संतुलित नीति अपनानी होगी—जहां वह अपनी जरूरतों को भी पूरा करे और क्षेत्रीय सहयोग भी बनाए रखे।

    सरकार फिलहाल स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर त्वरित निर्णय लेने की तैयारी में है।

    ईरान-अमेरिका युद्ध ने केवल पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित किया है। इस संकट में भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका की भारत से मदद की मांग यह दर्शाती है कि क्षेत्रीय स्तर पर भारत की अहमियत कितनी बढ़ चुकी है। आने वाले समय में भारत के फैसले न केवल उसकी अपनी अर्थव्यवस्था बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता को भी प्रभावित करेंगे।

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