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आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर इन दिनों अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ रहा है। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेता अनुराग ढांडा ने तीखा हमला बोला है, जिससे पार्टी में मतभेद और गहराते नजर आ रहे हैं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है और विपक्षी दलों के बीच टकराव चरम पर है।
अनुराग ढांडा ने राघव चड्ढा पर आरोप लगाया कि वे अब पार्टी की मूल विचारधारा और संघर्ष से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि AAP की पहचान निडरता और जनहित के मुद्दों पर खुलकर आवाज उठाने की रही है, लेकिन चड्ढा अब इन सिद्धांतों से पीछे हटते नजर आ रहे हैं। ढांडा के अनुसार, “जो नेता डर जाए, वह जनता के लिए कैसे लड़ेगा?” इस बयान ने पार्टी के भीतर नई बहस को जन्म दे दिया है।
ढांडा ने यह भी आरोप लगाया कि राघव चड्ढा संसद में अपने समय का सही उपयोग नहीं कर पाए। उनका कहना है कि जब देश के गंभीर मुद्दों पर चर्चा की जरूरत थी, तब चड्ढा ने छोटे-मोटे विषयों को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कई महत्वपूर्ण मुद्दों—जैसे गुजरात में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची विवाद—पर चड्ढा की चुप्पी सवाल खड़े करती है।
इस विवाद में एक और अहम बिंदु यह है कि जब पार्टी ने संसद से वॉकआउट किया, तब भी राघव चड्ढा सदन में मौजूद रहे। ढांडा ने इसे पार्टी लाइन के खिलाफ कदम बताते हुए कहा कि यह अनुशासनहीनता का संकेत है। उनके अनुसार, एक सच्चा पार्टी कार्यकर्ता नेतृत्व के फैसलों के साथ खड़ा रहता है।
इस पूरे विवाद के बीच अरविंद केजरीवाल का नाम भी चर्चा में है। ढांडा ने कहा कि AAP के कार्यकर्ता खुद को केजरीवाल का सिपाही मानते हैं और उनकी विचारधारा पर चलते हैं। ऐसे में अगर कोई नेता उस रास्ते से भटकता है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, पार्टी की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कुछ सूत्रों का कहना है कि यह सिर्फ आंतरिक मतभेद हैं, जिन्हें पार्टी के भीतर ही सुलझा लिया जाएगा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के सार्वजनिक बयान पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, AAP ने पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। दिल्ली और पंजाब में सत्ता हासिल करने के बाद पार्टी अब अन्य राज्यों में भी विस्तार की कोशिश कर रही है। ऐसे में आंतरिक विवाद पार्टी की रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
वहीं विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया है। उनका कहना है कि AAP खुद को एकजुट पार्टी बताती है, लेकिन अंदर ही अंदर बड़े स्तर पर मतभेद मौजूद हैं। इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से यह साफ होता है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर असहमति है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह विवाद सिर्फ व्यक्तिगत बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भविष्य और उसकी दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। यदि यह मतभेद लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो इसका असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, AAP के भीतर उभरा यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराता है या सुलझ जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि इस घटनाक्रम ने पार्टी के अंदरूनी हालात को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।








