कांग्रेस सांसद और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने ईरान-इजरायल संघर्ष और उसके बाद पश्चिम एशिया में बने नए कूटनीतिक समीकरणों पर विस्तृत टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत अपनी पारंपरिक संतुलित विदेश नीति का लाभ उठाने में सफल नहीं रहा। वहीं, पाकिस्तान को मिली चर्चा को उन्होंने वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धि मानने से इनकार किया।
भारत ने खोया संतुलन का लाभ
शशि थरूर का कहना है कि भारत ने वर्षों तक पश्चिम एशिया में एक संतुलित नीति अपनाई थी, जिसके तहत ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ समान रूप से मजबूत संबंध बनाए रखे गए। इसी वजह से भारत को एक भरोसेमंद और स्वतंत्र वैश्विक साझेदार माना जाता था।
हालांकि, उनके अनुसार हालिया संघर्ष के दौरान भारत का झुकाव एक पक्ष की ओर अधिक दिखाई दिया, जिससे उसकी पारंपरिक “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति कमजोर पड़ती नजर आई। उनका मानना है कि इससे भारत संभावित मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अवसर खो बैठा।
पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए सवाल
थरूर ने पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को स्वतंत्र शांति मध्यस्थ के रूप में देखना सही नहीं होगा।
उनके मुताबिक, पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान अधिकतर संदेश पहुंचाने वाले माध्यम की भूमिका निभाई। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी वास्तविक मध्यस्थ के पास दोनों पक्षों को प्रभावित करने की स्वतंत्र क्षमता होती है, जबकि पाकिस्तान की भूमिका सीमित रही।
‘मध्यस्थ नहीं, संदेशवाहक’
शशि थरूर ने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद में मध्यस्थ वही माना जाता है, जो स्वतंत्र रूप से दोनों पक्षों के बीच विश्वास कायम कर सके। उनके अनुसार पाकिस्तान की भूमिका इससे अलग थी और वह केवल संवाद का माध्यम बना।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी देश की असली कूटनीतिक ताकत उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता से तय होती है, न कि केवल बातचीत का हिस्सा बनने से।
भारत को क्या सीख लेनी चाहिए?
थरूर ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी पारंपरिक “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति को और मजबूत करना चाहिए, ताकि वह भविष्य में ऐसे अंतरराष्ट्रीय संकटों में विश्वसनीय और स्वीकार्य भूमिका निभा सके।
उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्र विदेश नीति रही है और उसे किसी एक धड़े के करीब दिखने से बचना चाहिए।
पाकिस्तान को लेकर भी दी चेतावनी
अपने लेख में थरूर ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपनी भूमिका को लेकर अतिशयोक्ति से बचना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में शामिल होना और वास्तविक रणनीतिक प्रभाव रखना दोनों अलग-अलग बातें हैं।
उन्होंने लिखा कि भविष्य में यदि शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो कई देशों को उसका श्रेय मिलेगा, लेकिन इससे किसी देश की वैश्विक रणनीतिक स्थिति स्वतः नहीं बदल जाती।
पश्चिम एशिया में नई कूटनीतिक चुनौती
थरूर के अनुसार, हालिया संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में विदेश नीति में संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उनका मानना है कि भारत को अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।








