दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामद होने के मामले में संसद द्वारा गठित जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पूर्व जज नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।
यह मामला मार्च 2025 में उस समय सामने आया था, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद कथित तौर पर एक स्टोररूम से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी।
सरकारी आवास में आग के बाद मिली थी नकदी
रिपोर्ट के अनुसार, 14 मार्च 2025 की रात जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लग गई थी।
आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को आवास के एक स्टोररूम में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जले हुए 500 रुपये के नोट मिले थे।
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि स्टोररूम में बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली, जिसका कोई स्पष्ट स्रोत या स्वामित्व सामने नहीं आया।
नकदी की मौजूदगी का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए वर्मा
संसदीय समिति ने कहा कि पूर्व जज यशवंत वर्मा नकदी की मौजूदगी को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में असफल रहे।
रिपोर्ट में उनके द्वारा 22 मार्च 2025 को दिए गए जवाब का भी उल्लेख किया गया है। समिति के अनुसार, उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि वर्मा का जवाब स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी की भावना से कमजोर था।
समिति ने जांच में सबूतों के संरक्षण पर भी सवाल उठाए
संसदीय समिति ने केवल नकदी की मौजूदगी पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि मामले की शुरुआती जांच और सबूतों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणी की।
रिपोर्ट के अनुसार, महत्वपूर्ण साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित और संरक्षित नहीं किया गया।
समिति ने कहा कि स्टोररूम को कानूनी रूप से सील और निरीक्षण किए जाने से पहले वहां की स्थिति में बदलाव किया गया था।
नकदी के बाद गायब होने पर भी सवाल
समिति ने यह भी कहा कि बरामद नकदी के बाद में गायब होने या उपलब्ध नहीं रहने की स्थिति का कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं मिला।
रिपोर्ट में साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में विफलता और परिसर से जुड़े कर्मचारियों द्वारा स्टोररूम में बदलाव किए जाने को महत्वपूर्ण कारण बताया गया है।
समिति के अनुसार, इससे मामले से जुड़े महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण पर सवाल खड़े हुए।
समिति को नहीं मिला सबूत कि वर्मा ने खुद नकदी हटाई
हालांकि, जांच समिति ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की है।
रिपोर्ट के अनुसार, समिति को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने व्यक्तिगत रूप से नकदी को वहां से हटाया था।
इसके बावजूद समिति ने नकदी की मौजूदगी और उसके संबंध में दिए गए उनके स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना।
पहले भी इन-हाउस कमेटी ने उठाए थे सवाल
इस मामले की जांच इससे पहले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना द्वारा गठित एक इन-हाउस कमेटी ने भी की थी।
उस समिति ने निष्कर्ष दिया था कि जस्टिस वर्मा का उस विशेष स्टोररूम पर “सक्रिय या मौन नियंत्रण” था, जहां नकदी रखी गई थी।
इसके बाद मामले ने न्यायपालिका और संसद दोनों में गंभीर सवाल खड़े किए।
संसद में शुरू हुई थी हटाने की प्रक्रिया
मामला सार्वजनिक होने के बाद संसद में जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
हालांकि, बाद में जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया। इसके चलते उन्हें हटाने की संसदीय प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई।
वह दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे और विवाद के बाद उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस भेजा गया था।
दो खंडों में तैयार हुई समिति की रिपोर्ट
संसदीय समिति की रिपोर्ट दो खंडों में है। इसमें जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को भी शामिल किया गया है।
समिति ने उपलब्ध साक्ष्यों और जस्टिस वर्मा के जवाबों की समीक्षा के बाद नकदी बरामदगी मामले में उनके खिलाफ गंभीर निष्कर्ष दर्ज किए हैं।
न्यायपालिका की जवाबदेही पर फिर उठे सवाल
यशवंत वर्मा नकदी मामले ने न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत जिम्मेदारी को लेकर व्यापक सवाल खड़े किए हैं।
संसदीय समिति की रिपोर्ट में जहां नकदी की मौजूदगी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलने की बात कही गई है, वहीं जांच के दौरान साक्ष्यों के संरक्षण में हुई कथित कमियों पर भी चिंता जताई गई है।
फिलहाल समिति की रिपोर्ट इस मामले में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आई है।
पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामदगी के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित संसदीय समिति ने उन्हें दोषी पाया है। समिति के अनुसार, वर्मा नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। रिपोर्ट में उनके जवाब को पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी की कसौटी पर भी असंतोषजनक बताया गया है। समिति ने जांच के दौरान सबूतों के उचित संरक्षण न होने और बाद में नकदी के उपलब्ध न रहने पर भी सवाल उठाए। हालांकि, समिति को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि वर्मा ने व्यक्तिगत रूप से नकदी हटाई थी। इससे पहले तत्कालीन CJI संजय खन्ना की इन-हाउस कमेटी ने उनके स्टोररूम पर सक्रिय या मौन नियंत्रण की बात कही थी। विवाद के बाद संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद यह प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई।








