




देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ कहे जाने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के कर्मचारी पिछले कई दिनों से हड़ताल पर हैं। उनकी मांगों को लेकर जारी गतिरोध अब गंभीर रूप ले चुका है। इस बीच सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सरकार और संबंधित विभाग जल्द ही इस पर अहम फैसला लेने की तैयारी में हैं।
NHM कर्मचारी लंबे समय से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। इनमें प्रमुख हैं:
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नौकरी की स्थिरता (Job Security): संविदा (Contract) पर काम कर रहे कर्मचारियों की स्थायी नियुक्ति।
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वेतनवृद्धि (Salary Hike): महंगाई को देखते हुए बेहतर वेतनमान और भत्ते।
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समान कार्य के लिए समान वेतन: स्थायी और संविदा कर्मचारियों में भेदभाव खत्म करना।
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सुरक्षा और सुविधाएँ: अस्पतालों में ड्यूटी के दौरान उचित सुरक्षा और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराना।
NHM कर्मचारियों की हड़ताल का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।
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ओपीडी और जननी सेवाएँ प्रभावित – कई सरकारी अस्पतालों में सामान्य जांच और मातृत्व सेवाएँ बाधित हुई हैं।
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टीकाकरण कार्यक्रम पर असर – ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में चल रहे टीकाकरण व जागरूकता अभियान धीमे पड़ गए हैं।
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आपातकालीन सेवाएँ चुनौतीपूर्ण – मरीजों को समय पर उपचार न मिलने से स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों में यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) NHM स्टाफ पर ही निर्भर रहते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय और NHM यूनियन के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
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यूनियन का कहना है कि उनकी मांगें जायज़ हैं और लंबे समय से लंबित हैं।
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वहीं सरकार का कहना है कि कर्मचारियों की समस्याओं पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, आने वाले हफ्ते में कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है जिससे हड़ताल खत्म होने की उम्मीद है।
मरीजों और उनके परिवारों को सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
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इलाज के लिए आने वाले मरीजों को घंटों इंतज़ार करना पड़ रहा है।
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कई जगहों पर निजी अस्पतालों का रुख करना मजबूरी बन गया है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
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गर्भवती महिलाओं और बच्चों के टीकाकरण जैसी सेवाएँ ठप होने से स्वास्थ्य खतरे और बढ़ गए हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत देशभर में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। इनमें नर्स, डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, लैब टेक्नीशियन और अन्य स्टाफ शामिल हैं।
इनकी हड़ताल से न केवल बड़े शहरों बल्कि छोटे कस्बों और गाँवों में स्वास्थ्य सेवाओं का संकट और गहरा गया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि:
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सरकार को जल्द से जल्द कर्मचारियों की जायज़ मांगें माननी चाहिए।
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स्वास्थ्य क्षेत्र में संविदा व्यवस्था को धीरे-धीरे खत्म कर स्थायी नियुक्तियों पर जोर देना चाहिए।
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लंबे समय तक हड़ताल से जनस्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
NHM कर्मचारियों का कहना है कि वे जनता की सेवा करना चाहते हैं, लेकिन असुरक्षित नौकरी और कम वेतन उनकी मजबूरी है।
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समाज का भी मानना है कि जो कर्मचारी दिन-रात स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं, उन्हें स्थिरता और सम्मान मिलना चाहिए।
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हड़ताल से यह साफ हो गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं का आधार स्टाफ ही है और उनकी समस्याओं का समाधान किए बिना व्यवस्था नहीं चल सकती।
सरकार जल्द ही नई नीति और वित्तीय पैकेज लाने की तैयारी में है, जिससे कर्मचारियों की नाराजगी दूर की जा सके।
संभावना है कि:
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कुछ कर्मचारियों की स्थायी नियुक्ति पर विचार हो सकता है।
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वेतन वृद्धि और भत्तों को मंजूरी मिल सकती है।
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सुरक्षा और प्रशिक्षण सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।
NHM कर्मचारियों की हड़ताल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव इन्हीं कर्मचारियों पर टिकी है। अगर उनकी समस्याओं का समाधान जल्द नहीं हुआ तो देश की स्वास्थ्य सेवाएँ और गंभीर संकट का सामना कर सकती हैं। अब सभी की निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि वह कब और कैसे इस गतिरोध को समाप्त करती है।