




राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण बयान दिया, जिसने मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ मथुरा और काशी में मंदिर निर्माण के लिए चल रहे आंदोलनों में औपचारिक रूप से भाग नहीं लेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से इन आंदोलनों में भाग लेने से नहीं रोकेगा। यह बयान संघ की पारंपरिक नीति और उसकी दृष्टि को दर्शाता है, जिसमें संगठन राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों से दूरी बनाए रखने पर जोर देता है।
संघ की यह नीति वर्षों से स्पष्ट रही है कि वह किसी आंदोलन में औपचारिक रूप से भाग नहीं लेता, लेकिन स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत स्तर पर धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने की स्वतंत्रता देता है। इस बार मथुरा और काशी के मुद्दों को लेकर यह स्पष्ट रुख और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इन क्षेत्रों में मंदिर निर्माण और उससे जुड़े आंदोलन ने राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील माहौल पैदा कर दिया है।
संघ का आधिकारिक रुख
मोहन भागवत ने यह बयान एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिया। उन्होंने कहा:
“संघ किसी भी आंदोलन में औपचारिक रूप से भाग नहीं लेता है, लेकिन यह अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से किसी भी धार्मिक या सामाजिक गतिविधि में भाग लेने से नहीं रोकता।”
यह बयान संघ की पारंपरिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। संघ वर्षों से धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में मार्गदर्शन और चेतना फैलाने तक अपनी भूमिका सीमित रखता आया है, जबकि सक्रिय रूप से आंदोलन या संघर्ष में शामिल होने से बचता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संघ का यह रुख दो महत्वपूर्ण संदेश देता है: एक, संगठन राजनीतिक या संवेदनशील आंदोलनों में सीधे तौर पर शामिल नहीं होगा; और दो, यह अपने स्वयंसेवकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करता है।
मथुरा और काशी के मुद्दे
मथुरा और काशी में मंदिर निर्माण को लेकर चल रहे आंदोलनों ने हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर काफी ध्यान आकर्षित किया है। ये आंदोलन धार्मिक भावनाओं से जुड़े होने के कारण संवेदनशील हैं।
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मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को लेकर वर्षों से विवाद और मांगें रही हैं।
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काशी (वाराणसी) में काशी विश्वनाथ मंदिर के आस-पास के इलाके को लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे उठते रहे हैं।
इन आंदोलनों में कई धार्मिक और सामाजिक संगठन सक्रिय रूप से शामिल हैं। जबकि संघ ने इन आंदोलनों से दूरी बनाए रखने का निर्णय लिया है, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वह इन मुद्दों पर अपनी स्थिति से पीछे नहीं हटेगा। संघ का दृष्टिकोण यह है कि धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों में उसका मार्गदर्शन हमेशा रहेगा, लेकिन आंदोलन के संचालन में शामिल नहीं होगा।
स्वयंसेवकों की भूमिका
संघ प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि संघ अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से किसी आंदोलन में भाग लेने से नहीं रोकता। यदि कोई स्वयंसेवक मथुरा या काशी में मंदिर निर्माण के लिए चल रहे आंदोलनों में व्यक्तिगत रूप से शामिल होना चाहता है, तो संघ उसे रोकने का अधिकारी नहीं है।
यह बात संघ की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नीति को दर्शाती है। इसका मतलब यह है कि संघ संगठनात्मक रूप से आंदोलन में नहीं है, लेकिन स्वयंसेवक अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण और विश्वास के अनुसार भाग ले सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम संघ की समझदारी को दर्शाता है। क्योंकि सीधे तौर पर आंदोलन में शामिल होना संघ के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है, वहीं स्वयंसेवकों की भागीदारी व्यक्तिगत स्तर पर संगठन की नैतिक और सांस्कृतिक छवि को भी बनाए रखती है।
संघ की नीति और दृष्टिकोण
संघ की यह नीति उसकी पारंपरिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। संगठन हमेशा से धार्मिक और सामाजिक मुद्दों में मार्गदर्शन, जागरूकता और संस्कृति संरक्षण तक अपनी भूमिका सीमित रखता आया है।
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राजनीतिक या सामाजिक आंदोलनों में औपचारिक रूप से भाग नहीं लेना संघ की स्थिर नीति है।
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धार्मिक मुद्दों में मार्गदर्शन और सलाह देने तक ही संघ का कार्यक्षेत्र सीमित है।
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स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से भाग लेने की स्वतंत्रता देना संघ की लोकतांत्रिक सोच और व्यक्तिगत निर्णय का सम्मान दर्शाता है।
विश्लेषकों के अनुसार, संघ इस नीति के माध्यम से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक लक्ष्यों को बिना राजनीतिक विवाद में फंसे आगे बढ़ा रहा है।
भविष्य की दिशा
संघ ने यह स्पष्ट किया है कि वह मथुरा और काशी के मुद्दों पर अपनी स्थिति से पीछे नहीं हटेगा। हालांकि, उसने इन मुद्दों पर औपचारिक रूप से कोई आंदोलन शुरू करने की योजना नहीं बनाई है।
संघ का मानना है कि इन मुद्दों का समाधान सामाजिक और धार्मिक संवाद के माध्यम से होना चाहिए, न कि आंदोलन या संघर्ष के द्वारा। इसका मतलब है कि संगठन विवादों में सक्रिय हस्तक्षेप के बजाय शिक्षा, जागरूकता और परंपरा संरक्षण के माध्यम से अपनी भूमिका निभाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुख संघ के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि धार्मिक आंदोलनों में भाग लेने से संगठन पर राजनीतिक दबाव और कानूनी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण
मथुरा और काशी के मुद्दे राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील हैं। ये आंदोलन न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़े हैं, बल्कि चुनावी और सामाजिक रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
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राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दे चुनावी रणभूमि में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
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सामाजिक संगठन और नागरिक समाज भी इन मुद्दों में सक्रिय हैं।
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संघ का रुख आंदोलन से दूरी बनाए रखने का, राजनीतिक जोखिम कम करने और संगठन की स्थिरता सुनिश्चित करने का संकेत है।
संघ का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि संगठन सांस्कृतिक और धार्मिक जागरूकता को बढ़ाने पर केंद्रित है, न कि राजनीतिक लाभ या आंदोलन संचालन पर।
निष्कर्ष
मोहन भागवत के बयान ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मथुरा और काशी के मंदिर निर्माण आंदोलनों में औपचारिक रूप से शामिल नहीं होगा, लेकिन अपने स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से भाग लेने से नहीं रोकेगा।
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