भारत सरकार ने हाल के वर्षों में जिस बड़े बुनियादी ढांचे की परियोजना पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है, वह है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट। यह योजना न केवल भारत की सुरक्षा और रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक मानी जा रही है, बल्कि इसमें पर्यावरण और स्थानीय जनजातीय जीवन के अस्तित्व को लेकर गंभीर बहस भी छिड़ी हुई है।
यह परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकसित की जा रही है। इसमें डीप सी पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट शामिल हैं। भारत सरकार का मानना है कि इस प्रोजेक्ट से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की पकड़ और मजबूत होगी।
हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी पर आज वैश्विक शक्तियों की नजर है। चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स स्ट्रैटेजी के तहत श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में कई बंदरगाहों का विकास किया है। भारत के लिए ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक जवाबी रणनीति है, जिससे वह हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित कर सके। यहां से होकर गुजरने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से दुनिया के एक बड़े हिस्से का व्यापार होता है। भारत अगर इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करता है, तो उसे व्यापार और रक्षा दोनों में बढ़त मिल सकती है।
इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण और जैव विविधता की है। ग्रेट निकोबार द्वीप पर कई दुर्लभ वन्य जीव, प्रवाल भित्तियां (coral reefs) और समुद्री प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां रहने वाली शोम्पेन जनजाति, जो दुनिया की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक है, के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, निर्माण कार्य और जनसंख्या दबाव से द्वीप की पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ सकता है।
केंद्र सरकार का कहना है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास दोनों के लिए जरूरी है। इससे रोज़गार के अवसर पैदा होंगे और स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। यह प्रोजेक्ट भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक प्रमुख केंद्र बना सकता है।
पर्यावरण कार्यकर्ता इसे विनाशकारी परियोजना बता रहे हैं। उनका तर्क है कि एक बार प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो गया तो उसे वापस लाना असंभव होगा। जनजातीय अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन की कानूनी सुरक्षा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश चाहते हैं कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करे। यह प्रोजेक्ट भारत को एक तरह से क्वाड (QUAD) देशों की रणनीति में अहम खिलाड़ी बना सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की नजर भी इस प्रोजेक्ट पर टिकी हुई है।
संभावित फायदे और नुकसान
फायदे:
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हिंद महासागर में भारत की पकड़ मजबूत होगी।
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चीन की बढ़ती गतिविधियों का संतुलन बनेगा।
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व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए भारत को नए अवसर मिलेंगे।
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रोजगार और निवेश के जरिए स्थानीय विकास होगा।
नुकसान:
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जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को भारी नुकसान होगा।
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स्थानीय आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर खतरा मंडराएगा।
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समुद्री प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ेगा।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत के लिए एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, जिससे वह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में चीन को चुनौती दे सके। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उतना ही अहम है कि क्या भारत अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारियों और जनजातीय अधिकारों की अनदेखी कर सकता है?
यह प्रोजेक्ट भारत के लिए विकास और सुरक्षा का प्रतीक है, लेकिन इसके साथ ही यह पर्यावरण और अस्तित्व की चुनौती भी है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि भारत इन दोनों के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।








