दिल्ली का ऐतिहासिक लाल किला, जो मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में 17वीं सदी में निर्मित हुआ था, अब प्रदूषण के कारण अपनी पहचान खोता जा रहा है। एक नई स्टडी में यह खुलासा हुआ है कि दिल्ली की जहरीली हवा के कारण किले की दीवारों पर काली परतें (ब्लैक क्रस्ट) जम रही हैं, जो न केवल किले की सुंदरता को प्रभावित कर रही हैं, बल्कि इसकी संरचनात्मक अखंडता के लिए भी खतरे की घंटी हैं।
लाल किला का निर्माण 1639 में शुरू हुआ और 1648 में पूरा हुआ। यह किला शाहजहाँ के शासनकाल में मुग़ल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। किले की दीवारें और महल विंध्य क्षेत्र के लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं, जो इसे लाल रंग प्रदान करते हैं। 2007 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था, और तब से यह भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पहचाना जाता है।
हाल ही में भारतीय और इतालवी वैज्ञानिकों के एक संयुक्त अध्ययन में यह पाया गया कि दिल्ली की वायु में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO₂) और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) जैसे प्रदूषक किले की दीवारों पर काली परतों के रूप में जमा हो रहे हैं। यह परतें किले की सुंदरता को प्रभावित कर रही हैं और दीवारों की संरचनात्मक अखंडता को भी खतरे में डाल रही हैं।
जब हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड किले की दीवारों पर स्थित कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, तो सल्फ्यूरिक एसिड (H₂SO₄) और नाइट्रिक एसिड (HNO₃) का निर्माण होता है। यह एसिड रेन के रूप में पत्थर की सतह पर गिरते हैं, जिससे कैल्शियम सल्फेट (Gypsum) का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया ‘सल्फेशन’ कहलाती है, जो किले की दीवारों पर काली परतों के रूप में दिखाई देती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन काली परतों में टाइटेनियम, निकल, कॉपर, जिंक, बेरियम और लेड जैसे भारी धातुएं मौजूद हैं। ये धातुएं वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुएं से उत्पन्न होती हैं और किले की दीवारों पर जमकर काली परतों का निर्माण करती हैं।
यह काली परतें किले की दीवारों को कमजोर कर रही हैं, जिससे नक्काशीदार डिज़ाइन और कलाकृतियाँ क्षतिग्रस्त हो रही हैं। इसके अलावा, एसिड रेन के प्रभाव से दीवारों पर छाले (Blistering) भी उत्पन्न हो रहे हैं, जो दीवारों की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं।
दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय मानकों से कई गुना अधिक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, 2021-2023 के दौरान किले के आसपास PM2.5 का स्तर 100 माइक्रोग्राम/घन मीटर से अधिक रहा, जो सुरक्षित सीमा (60 माइक्रोग्राम) से दोगुना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते उचित संरक्षण उपाय नहीं अपनाए गए, तो यह काली परतें किले की संरचनात्मक अखंडता के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इस समस्या पर चिंता जताई है और संरक्षण के विशेष उपाय करने की मांग की है।
यह अध्ययन प्रदूषण के प्रभाव को उजागर करता है और यह दर्शाता है कि प्रदूषण केवल मानव स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी खतरे की घंटी है। यदि हम अपने ऐतिहासिक स्मारकों को बचाना चाहते हैं, तो हमें प्रदूषण पर नियंत्रण पाना होगा और संरक्षण के उपायों को प्राथमिकता देनी होगी।








