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राम मंदिर मामले पर आए ऐतिहासिक फैसले को लेकर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर लगातार चर्चाएं और बहसें तेज हो गई हैं। इस बीच भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने इस मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह से कानून और संविधान के दायरे में लिया गया था और इसे किसी भी तरह की राजनीतिक या धार्मिक भावना से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि राम मंदिर से जुड़े फैसले पर जो भी निर्णय आया, वह न्यायालय में रखे गए दस्तावेज़ों, सबूतों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही दिया गया था। सोशल मीडिया पर जो बहसें चल रही हैं, उनमें से कई बिना तथ्यों के हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का काम केवल संविधान के अनुसार न्याय देना है, न कि भावनाओं या बाहरी दबावों के आधार पर निर्णय लेना।
उन्होंने ‘संविधान बचाओ मुहिम’ से जुड़े सवाल पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि संविधान हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है। न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह इस मूल भावना को बनाए रखे। चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत का लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था इसी वजह से मजबूत है क्योंकि यह कानून और संविधान की नींव पर खड़ा है।
राम मंदिर का फैसला सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनाया था। इस फैसले में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि विवादित भूमि रामलला विराजमान को दी जाएगी और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए अलग से पाँच एकड़ जमीन दी जाएगी। उस समय इस फैसले को ऐतिहासिक कहा गया था और इसे देश की सबसे बड़ी न्यायिक प्रक्रियाओं में से एक माना गया।
पूर्व सीजेआई ने यह भी कहा कि किसी भी फैसले को समझने के लिए जरूरी है कि लोग पूरी जजमेंट को पढ़ें, न कि केवल सोशल मीडिया पर आई अफवाहों और टिप्पणियों के आधार पर अपनी राय बनाएं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है।
चंद्रचूड़ ने इस अवसर पर यह भी दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा से ही कानून के शासन पर चलता आया है। कोई भी मामला कितना भी संवेदनशील क्यों न हो, उसका निपटारा तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाता है। उन्होंने कहा कि संविधान ही न्यायपालिका का मार्गदर्शक है और यह किसी भी राजनीतिक या धार्मिक दबाव से परे है।
राम मंदिर विवाद भारत के इतिहास का सबसे लंबा चला मामला था, जिसे आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त किया। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी देश पर गहरा असर डालने वाला साबित हुआ। ऐसे में पूर्व सीजेआई का यह बयान इस बहस को नई दिशा देता है और यह स्पष्ट करता है कि फैसले की नींव केवल कानून और संविधान पर ही आधारित थी।
उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अफवाहों या भ्रामक जानकारी पर भरोसा न करें और न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखें। उन्होंने कहा कि न्यायालय का हर निर्णय विस्तृत विचार-विमर्श और तथ्यों के गहन अध्ययन के बाद ही सामने आता है।
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के इस बयान को न्यायपालिका की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का प्रतीक माना जा रहा है। यह न केवल अयोध्या मामले पर चल रही बहस को शांत करने वाला है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका हर हाल में संविधान की मर्यादा और कानून की गरिमा को सर्वोपरि रखती है।
राम मंदिर फैसले को लेकर दिए गए इस स्पष्टीकरण से यह साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय किसी भी बाहरी प्रभाव या दबाव का परिणाम नहीं था, बल्कि यह भारतीय संविधान और कानून के सिद्धांतों पर आधारित एक निष्पक्ष और ऐतिहासिक फैसला था।








