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कर्नाटक की सियासत में इन दिनों नया मोर्चा खुल गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के गृह क्षेत्र गुरमितकल (जिला यादगीर) में पथ संचलन निकालने की अनुमति मिल गई है। यह अनुमति जिला प्रशासन ने कई कड़ी शर्तों के साथ दी है। इस निर्णय ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह वही इलाका है जहां कांग्रेस का जनाधार सबसे मजबूत माना जाता है।
यह पथ संचलन 5 नवंबर को आयोजित किया जाएगा और इसके लिए आरएसएस ने 23 अक्टूबर को जिला प्रशासन को एक आवेदन दिया था। आवेदन पर विचार करते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और शांति व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए 10 शर्तों के तहत सशर्त अनुमति प्रदान की है।
प्रशासन ने लगाई 10 सख्त शर्तें
यादगीर जिला प्रशासन ने आरएसएस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न होना चाहिए। किसी भी स्थिति में सांप्रदायिक भावना भड़काने, राजनीतिक नारेबाजी, या भड़काऊ भाषण की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इसके अलावा पथ संचलन के मार्ग को लेकर भी विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। संघ कार्यकर्ताओं को केवल निर्धारित मार्ग से गुजरने की अनुमति होगी और रास्ते में किसी धार्मिक स्थल या राजनीतिक कार्यालय के पास रुकने की मनाही है।
साथ ही, लाउडस्पीकर का प्रयोग सीमित ध्वनि सीमा में करने के आदेश दिए गए हैं। कार्यक्रम के दौरान पुलिस की निगरानी में वीडियोग्राफी भी अनिवार्य की गई है ताकि किसी भी संभावित विवाद या दुष्प्रचार को रोका जा सके।
गुरमितकल में पथ संचलन क्यों बना चर्चा का विषय
गुरमितकल, मल्लिकार्जुन खरगे का राजनीतिक गढ़ है। यहां से उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी और यह इलाका पारंपरिक रूप से कांग्रेस समर्थक माना जाता है। ऐसे में संघ द्वारा इसी इलाके में पथ संचलन निकालने का फैसला कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम कर्नाटक में बढ़ते ध्रुवीकरण और कांग्रेस बनाम संघ की वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है।
बीते कुछ वर्षों में आरएसएस ने राज्य के कई जिलों में अपने कार्यक्रमों का विस्तार किया है, और अब वह गुरमितकल जैसे कांग्रेस गढ़ों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है।
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
आरएसएस को मिली इस अनुमति के बाद कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाए हैं।
स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कहा कि “यह इलाका शांतिपूर्ण है, लेकिन इस तरह के आयोजन से समाज में अनावश्यक तनाव बढ़ सकता है।”
कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन पर राजनीतिक दबाव डालकर यह अनुमति दिलाई गई है।
हालांकि, जिला प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि,
“आरएसएस ने सभी औपचारिकताएं पूरी की हैं और शर्तों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी स्वयं संगठन की होगी। अगर किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पाई गई तो अनुमति तुरंत रद्द कर दी जाएगी।”
आरएसएस का पक्ष
आरएसएस के जिला प्रचार प्रमुख बसप्पा संजानोल, जिन्होंने यह आवेदन दिया था, ने कहा कि पथ संचलन का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय एकता और अनुशासन का प्रदर्शन है। उन्होंने कहा,
“हमारा कार्यक्रम किसी के खिलाफ नहीं है। यह परंपरागत पथ संचलन है जो हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित किया जाता है। गुरमितकल में इसे आयोजित करने का फैसला पूरी तरह संगठनात्मक स्तर पर लिया गया है, न कि राजनीतिक।”
राजनीतिक माहौल में बढ़ी गरमाहट
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार और केंद्र की नीतियों को लेकर पहले से ही तनाव चल रहा है।
प्रदेश में संघ और कांग्रेस के बीच वैचारिक खींचतान नई नहीं है, लेकिन खरगे के गृह जिले में संघ की सक्रियता ने इसे राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह कार्यक्रम 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले माहौल को प्रभावित करने की कोशिश हो सकता है। संघ जहां अपने संगठनात्मक प्रभाव को दक्षिण भारत में मजबूत करना चाहता है, वहीं कांग्रेस इसे अपने जनाधार पर हमले के रूप में देख रही है।
कर्नाटक के गुरमितकल में आरएसएस को सशर्त पथ संचलन की अनुमति मिलना सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि यह राज्य की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत है। मल्लिकार्जुन खरगे के गढ़ में संघ की एंट्री से जहां कांग्रेस की चिंता बढ़ी है, वहीं आरएसएस के लिए यह वैचारिक और रणनीतिक विजय के रूप में देखा जा रहा है।








