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  • छठी मईया की बेटी ‘बिहार कोकिला’ शारदा सिन्हा को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि, बोले– उनके गीतों में बसता है जनमानस

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    बिहार की सुरों की मल्लिका और लोकगायिका ‘बिहार कोकिला’ शारदा सिन्हा की पहली पुण्यतिथि पर पूरे देश ने उन्हें याद किया। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट लिखकर कहा कि शारदा सिन्हा ने बिहार की समृद्ध लोकसंस्कृति को न केवल देश बल्कि विदेशों तक पहुंचाया।

    पीएम मोदी ने अपने संदेश में लिखा, “शारदा जी ने बिहार की कला और संस्कृति को लोकगीतों के माध्यम से एक नई पहचान दी, जिसके लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा। महापर्व छठ से जुड़े उनके सुमधुर गीत हमेशा जनमानस में रचे-बसे रहेंगे। उन्होंने लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखा और पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखा।”

    प्रधानमंत्री के इस संदेश के बाद सोशल मीडिया पर भावनाओं की बाढ़ आ गई। लोग ‘#ShardaSinha’ और ‘#BiharKokila’ जैसे हैशटैग के साथ उनके गीत साझा कर रहे हैं। हजारों लोगों ने उनके लोकप्रिय छठ गीत — “हो दिनानाथ… माई के चरणवा में…” और “कांच ही बांस के बहंगिया…” को फिर से सुनकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

    शारदा सिन्हा सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि बिहार की लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान थीं। मिथिला, मगध, और भोजपुर की परंपराओं को उन्होंने अपनी मधुर आवाज़ में इस तरह पिरोया कि हर गीत एक भावना बन गया। विशेष रूप से छठ पर्व के समय उनके गीत हर घर में गूंजते थे। उनकी आवाज़ में वह भक्ति, सादगी और मिट्टी की खुशबू थी जो सीधे दिल को छू जाती थी।

    उनका सफर बेहद प्रेरणादायक रहा। 1970 के दशक में शारदा सिन्हा ने जब संगीत की दुनिया में कदम रखा, तब लोकगीतों को ज्यादा मंच नहीं मिलते थे। लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से न सिर्फ इस शैली को पुनर्जीवित किया बल्कि उसे आधुनिक संगीत की मुख्यधारा में भी शामिल करवाया। उनके गीतों ने भोजपुरी, मैथिली और मगही जैसी भाषाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

    शारदा सिन्हा ने अपने करियर में कई अवॉर्ड्स जीते, जिनमें पद्म भूषण और पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान भी शामिल हैं। लेकिन शायद उनका सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का प्रेम और सम्मान था। ग्रामीण भारत से लेकर महानगरों तक, हर कोई उनके गीतों में अपनी मिट्टी की गंध महसूस करता था।

    उनकी मृत्यु के बाद बिहार और पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। लोग उन्हें “छठी मईया की बेटी” कहकर संबोधित करते थे, क्योंकि उनके गीतों ने छठ पर्व को नई ऊंचाई दी थी। उनकी आवाज़ में छठ पूजा की भावनाएं आज भी जीवित हैं — चाहे वह घाटों पर गूंजने वाले भक्ति गीत हों या घर-आंगन में बजते लोक स्वर।

    प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दी गई श्रद्धांजलि ने इस बात को फिर से रेखांकित किया कि शारदा सिन्हा केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत की वाहक थीं। उनके गीत न केवल बिहार की, बल्कि पूरे भारत की आत्मा से जुड़े हैं।

    बिहार के मुख्यमंत्री, कई केंद्रीय मंत्रियों, कलाकारों और संगीत प्रेमियों ने भी उन्हें याद किया। पटना और दरभंगा में आयोजित श्रद्धांजलि सभाओं में लोगों ने उनके गीत गाकर उन्हें नमन किया। स्थानीय कलाकारों ने कहा कि शारदा सिन्हा ने लोकगीतों को वह सम्मान दिलाया, जो पहले कभी नहीं मिला था।

    आज भी जब छठ पर्व आता है, तो घाटों पर, मंदिरों में और घरों में उनकी आवाज़ गूंजती है। यह वही आवाज़ है जो पीढ़ियों को अपनी संस्कृति और परंपरा से जोड़ती है। उनकी विरासत आने वाले वर्षों तक संगीत की दुनिया में जिंदा रहेगी।

    शारदा सिन्हा की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री मोदी की श्रद्धांजलि ने यह साबित कर दिया कि सच्चे कलाकार समय की सीमाओं से परे होते हैं। उनकी गायकी, उनके भाव और उनकी पहचान सदैव भारतीय संस्कृति के आकाश में गूंजते रहेंगे।

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