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महाराष्ट्र के पारंपरिक मछुआरों ने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए नए एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) नियमों के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि ये नए नियम मछली उद्योग में बड़े कॉरपोरेट घरानों और वाणिज्यिक फिशिंग कंपनियों को बढ़ावा देते हैं, जिससे पारंपरिक मछुआरे अपनी ही धरती और समुद्र में हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।
मछुआरों के संगठनों का कहना है कि सरकार के नए नियमों के तहत गहरे समुद्र में मछली पकड़ने का अधिकार केवल पंजीकृत और लाइसेंस प्राप्त जहाजों को दिया जाएगा। इससे छोटे नौकाओं और पारंपरिक फिशिंग करने वालों के लिए गहरे समुद्र में जाना लगभग असंभव हो जाएगा। मछुआरों का आरोप है कि इन नियमों का सबसे बड़ा लाभ बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट्स को मिलेगा, जो पहले से ही समुद्री संसाधनों पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं।
मुंबई, ठाणे, रायगढ़, सिंधुदुर्ग और रत्नागिरी जैसे तटीय जिलों के मछुआरों ने कहा है कि ये नियम उनके पारंपरिक पेशे और समुदाय की जीवनशैली पर सीधा प्रहार हैं। एक स्थानीय मछुआरा नेता ने कहा, “हमारे पुरखे सदियों से इन समुद्रों में मछली पकड़ते आए हैं। अब सरकार ऐसे नियम बना रही है जिनसे हम अपने ही पानी में बाहरी लगने लगे हैं।”
नए नियमों के तहत 12 नॉटिकल माइल से बाहर यानी ईईजेड क्षेत्र में मछली पकड़ने के लिए सरकार ने सख्त दिशा-निर्देश और पंजीकरण प्रणाली लागू करने की बात कही है। मछुआरों का कहना है कि ये दिशा-निर्देश केवल बड़ी कंपनियों के लिए अनुकूल हैं, जिनके पास अत्याधुनिक जहाज, तकनीक और पूंजी है। जबकि पारंपरिक मछुआरे, जिनकी नावें छोटी और संसाधन सीमित हैं, वे इन शर्तों को पूरा नहीं कर सकते।
महाराष्ट्र मछुआरा संघ और नेशनल फिशवर्कर्स फोरम ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि समुद्र में मछली पकड़ने के अधिकारों पर कॉरपोरेट नियंत्रण बढ़ना केवल मछुआरों की जीविका ही नहीं, बल्कि समुद्री पर्यावरण के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ये नियम वापस नहीं लिए गए, तो राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
समुद्र विज्ञानी और पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी मछुआरों की चिंताओं का समर्थन किया है। उनका कहना है कि कॉरपोरेट फिशिंग से समुद्र की जैव विविधता पर गहरा असर पड़ता है। बड़े जहाज और ट्रॉलर समुद्र में अत्यधिक मात्रा में मछली पकड़ लेते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी असंतुलित हो जाती है और स्थानीय प्रजातियाँ खतरे में पड़ जाती हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर पारंपरिक मछुआरों को संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाले वर्षों में भारत की तटीय अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है।
महाराष्ट्र सरकार ने इस बीच कहा है कि नए नियमों का उद्देश्य समुद्री संसाधनों का “सतत उपयोग” सुनिश्चित करना है और यह नियम किसी भी समुदाय के खिलाफ नहीं हैं। राज्य मत्स्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, इन नियमों से अवैध फिशिंग पर अंकुश लगेगा और भारत की समुद्री संपदा की रक्षा की जा सकेगी।
हालांकि, मछुआरों का कहना है कि उन्हें नीति-निर्माण प्रक्रिया में शामिल ही नहीं किया गया। उनका तर्क है कि सरकार ने न तो समुदायों से संवाद किया और न ही उनकी आर्थिक और सांस्कृतिक निर्भरता को समझा। अब जब ये नियम लागू किए जा रहे हैं, तो उनके लिए अपनी आवाज़ बुलंद करना ही एकमात्र रास्ता बचा है।
मछुआरों की मांग है कि सरकार पारंपरिक और छोटे मछुआरों को प्राथमिकता देते हुए विशेष नीतियाँ बनाए। इसके साथ ही, मछुआरों को वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और ईंधन पर सब्सिडी जैसे प्रावधानों को भी लागू किया जाए ताकि वे प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
वर्तमान परिदृश्य में महाराष्ट्र का यह संघर्ष केवल मछली उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह “समुद्र और संसाधनों पर अधिकार” की लड़ाई बन चुका है। समुद्र के किनारे बसी इन बस्तियों में हर सुबह जब सूरज उगता है, तो मछुआरों की निगाहें केवल मछलियों पर नहीं, बल्कि अपने भविष्य पर भी टिकी रहती हैं।
सरकार और मछुआरों के बीच यह संघर्ष आने वाले समय में महाराष्ट्र की तटीय राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करेगा। यदि सरकार ने समय रहते समाधान नहीं निकाला, तो यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर मछुआरा आंदोलनों की नई लहर को जन्म दे सकता है।








