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महाराष्ट्र में अगले कुंभ मेले की तैयारियों से पहले ही राजनीति गरमा गई है। राज्य सरकार में मंत्री और भाजपा विधायक नितेश राणे ने एक विवादित बयान देकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि आगामी नासिक कुंभ मेले में गैर-हिंदू व्यापारियों को दुकानें लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। राणे का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है और इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई है।
नितेश राणे ने मीडिया से बातचीत में कहा, “कुंभ मेला हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा पर्व है। इसमें देशभर से लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह धार्मिक आयोजन है, न कि वाणिज्यिक बाजार। इसलिए, गैर-हिंदू व्यापारियों को इसमें दुकानें या स्टॉल लगाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। ऐसे लोगों की भागीदारी से इस आयोजन की पवित्रता प्रभावित हो सकती है।”
उन्होंने आगे कहा कि कुंभ मेले में आने वाले श्रद्धालु धार्मिक भावनाओं के साथ यहां आते हैं और यह जरूरी है कि आयोजन का माहौल पूरी तरह धार्मिक और सांस्कृतिक भावना के अनुरूप रहे। राणे ने यह भी सुझाव दिया कि राज्य सरकार को इस बाबत एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी तरह का विवाद या विरोध न हो।
नासिक में 2027 में होने वाला कुंभ मेला देशभर का एक बड़ा धार्मिक आयोजन है, जिसकी तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। प्रशासन के अनुसार, इस बार करीब 2 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। ऐसे में, अस्थायी दुकानों, लंगरों, और सेवा केंद्रों की संख्या हजारों में होगी। इसी संदर्भ में राणे का बयान सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने राणे के बयान की आलोचना की है। कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंढे ने कहा, “कुंभ मेला भारत की सांस्कृतिक विरासत है, जो सबको जोड़ने का प्रतीक है। किसी समुदाय को इसमें भागीदारी से रोकना संविधान की भावना के खिलाफ है।” वहीं, एनसीपी ने इसे “धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति” बताया और कहा कि इस तरह के बयान समाज में विभाजन को बढ़ावा देते हैं।
दूसरी ओर, भाजपा और राणे के समर्थकों ने उनके बयान का बचाव किया है। भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं का कहना है कि नितेश राणे ने केवल श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं की सुरक्षा की बात की है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ आयोजनों में कुछ बाहरी व्यापारियों के कारण विवाद खड़े हुए थे, जिससे यह मांग उठी कि केवल पंजीकृत हिंदू संगठनों और स्थानीय स्वयंसेवकों को ही दुकानें लगाने की अनुमति दी जाए।
नासिक के स्थानीय प्रशासन ने फिलहाल इस बयान पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, कुंभ मेले की तैयारी में शामिल समितियों को निष्पक्ष और संवैधानिक रूप से संतुलित नीति अपनाने के निर्देश पहले से दिए गए हैं। प्रशासन का मानना है कि किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता, लेकिन सुरक्षा और व्यवस्था के दृष्टिकोण से सभी व्यापारियों का सत्यापन अनिवार्य किया जाएगा।
धार्मिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी दो धड़ों में बंट गई हैं। कुछ हिंदू संगठनों ने राणे की बात का समर्थन किया है, यह कहते हुए कि “कुंभ का स्वरूप धार्मिक है, इसलिए व्यापारिक गतिविधियों को सीमित रखना आवश्यक है।” वहीं, कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि “कुंभ का असली संदेश समरसता और सद्भाव का है, ऐसे में बहिष्कार जैसी मांग गलत है।”
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान आने वाले चुनावों के मद्देनजर दिया गया हो सकता है। नासिक और आसपास के जिलों में धार्मिक आयोजन अक्सर राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र बनते हैं। राणे के इस बयान को भी उसी सियासी संदर्भ में देखा जा रहा है।
कुंभ मेला 2027 नासिक के लिए न केवल धार्मिक, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी बड़ा आयोजन होगा। यहां लाखों तीर्थयात्रियों की भीड़ से स्थानीय व्यापार, होटल उद्योग और परिवहन व्यवस्था को बड़ा फायदा होता है। इसलिए प्रशासन अब इस पूरे विवाद को शांतिपूर्वक संभालने की कोशिश कर रहा है ताकि तैयारियों पर कोई असर न पड़े।
फिलहाल नितेश राणे के बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है — क्या धार्मिक आयोजनों में समुदाय आधारित भागीदारी पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए या नहीं? आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब कुंभ की तैयारियां अपने अंतिम चरण में पहुंचेंगी।








