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महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार के बेटे पार्थ पवार एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। सरकारी जमीन की संदिग्ध लैंड डील मामले में अब रजिस्ट्रार ऑफिस ने बड़ा कदम उठाया है। खबरों के अनुसार, 40 एकड़ की सरकारी जमीन के सौदे को रद्द करने के लिए भी पार्थ पवार की कंपनी को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। रजिस्ट्रार ऑफिस ने कंपनी Amadea Enterprises LLP को 21 करोड़ रुपये की स्टाम्प ड्यूटी और जुर्माना भरने का नोटिस जारी किया है।
यह मामला पुणे के पास की एक जमीन से जुड़ा हुआ है, जिसकी मार्केट वैल्यू लगभग 1800 करोड़ रुपये बताई जा रही है। आरोप है कि पार्थ पवार की कंपनी ने इस जमीन को मात्र 300 करोड़ रुपये में खरीदा था। यह डील सामने आने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया था। विपक्ष ने इस सौदे को “सरकारी संपत्ति की लूट” बताते हुए पवार परिवार पर गंभीर आरोप लगाए थे।
मामले के बढ़ने पर डिप्टी सीएम अजित पवार ने शुक्रवार को मीडिया के सामने सफाई दी थी। उन्होंने दावा किया था कि यह डील रद्द कर दी गई है और इसमें कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। लेकिन शनिवार को इस मामले ने नया मोड़ ले लिया जब रजिस्ट्रार ऑफिस ने डील रद्द करने के बावजूद कंपनी पर स्टाम्प ड्यूटी और पेनाल्टी की मांग की। इससे पार्थ पवार के लिए कानूनी और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर मुश्किलें बढ़ गई हैं।
रजिस्ट्रार ऑफिस के अनुसार, भले ही कंपनी डील को रद्द करना चाहती हो, लेकिन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, इसलिए स्टाम्प ड्यूटी की देनदारी खत्म नहीं होती। कानून के अनुसार, एक बार डील रजिस्टर हो जाने के बाद उसे निरस्त करने पर भी निर्धारित शुल्क और पेनाल्टी देनी होती है। इसीलिए पार्थ पवार की कंपनी को 21 करोड़ रुपये का भुगतान करना अनिवार्य बताया गया है।
Amadea Enterprises LLP में पार्थ पवार की 99 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि बाकी शेयर उनके सहयोगियों के पास हैं। इस कंपनी पर पहले से ही जांच एजेंसियों की नजर बनी हुई है। इस लैंड डील से जुड़े मामले में पहले ही दो एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें दिग्विजय पाटिल और शीतल तेजवाणी को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि सरकारी जमीन को “अवैध तरीके से” कम दाम में हासिल करने के लिए फर्जी दस्तावेजों और प्रभाव का इस्तेमाल किया गया।
राजनीतिक हलकों में इस मामले ने गरमा गर्मी बढ़ा दी है। विपक्षी दलों ने इसे महाराष्ट्र सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल बताया है। कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) नेताओं ने कहा है कि यह मामला सीधे सत्ता के दुरुपयोग की ओर इशारा करता है और इसमें पारदर्शिता की कमी साफ दिखती है। वहीं एनसीपी (अजित गुट) के समर्थक नेताओं ने बचाव में कहा है कि पार्थ पवार की कंपनी ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है और किसी तरह की गलत मंशा नहीं थी।
महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को अजित पवार के लिए एक “इमेज क्राइसिस” मान रहे हैं। अजित पवार पहले ही अपने गुट की वैधता और भाजपा गठबंधन में अपने राजनीतिक प्रभाव को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में बेटे से जुड़ा यह मामला उनकी साख पर असर डाल सकता है।
अब रजिस्ट्रार ऑफिस के इस नोटिस के बाद अगला कदम क्या होगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। यदि कंपनी 21 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं करती है तो सरकार आगे की कार्रवाई कर सकती है, जिसमें डील की वैधता को पूरी तरह रद्द करना या कानूनी जब्ती भी शामिल हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा महाराष्ट्र विधानसभा और मीडिया दोनों में गर्म रहेगा। विपक्ष इसे बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, वहीं अजित पवार को अपनी छवि बचाने के लिए ठोस कानूनी और जनसंपर्क रणनीति अपनानी होगी।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्ता से जुड़ी कंपनियों और नेताओं को सरकारी संपत्तियों के सौदों में विशेष सुविधा दी जाती है? पार्थ पवार केस इसका ताजा उदाहरण बन गया है, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है।







