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  • मुगल काल से आधुनिक युग तक कथक हुआ और भी लचीला: शमा भाटे ने बताई अपनी 75 वर्ष की नृत्य यात्रा की कहानी

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    भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में कथक का नाम सदियों से गूंजता आ रहा है। यह नृत्य सिर्फ मंच की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इसी परंपरा को जीवित रखने में अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित करने वाली प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना शमा भाटे ने हाल ही में अपने 75 वर्ष के नृत्य सफर पर बातचीत की। उन्होंने बताया कि कैसे कथक समय, समाज और सत्ता के बदलावों से गुजरते हुए एक लचीली और जीवंत कला बन गया।

    पुणे की रहने वाली शमा भाटे देश की उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने कथक को महाराष्ट्र जैसे दक्षिण भारतीय प्रभाव वाले राज्य में लोकप्रिय बनाया। वे प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना रोहिणी भाटे की शिष्या और बहू हैं। रोहिणी भाटे ने जहां कथक को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक धरती पर बोया, वहीं शमा भाटे ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया और सैकड़ों शिष्याओं को तैयार किया। हाल ही में जब उन्होंने अपने जीवन के 75 वर्ष पूरे किए, तो उनके शिष्यों और प्रशंसकों ने भव्य ‘अमृतोत्सव’ का आयोजन कर उन्हें सम्मानित किया।

    इस अवसर पर शमा भाटे को पंडित दीनानाथ मंगेशकर अवॉर्ड देने की भी घोषणा की गई, जो उनके दशकों के योगदान का प्रतीक है। उन्होंने इस अवसर पर अपनी नई मराठी पुस्तक ‘नृत्यमय जग… नर्तनाचा धर्म…’ भी प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने कथक की आत्मा, उसके रूपांतरण और उसकी दार्शनिक गहराई पर विस्तार से चर्चा की है।

    अपनी यात्रा को याद करते हुए शमा भाटे ने कहा कि कथक की सुंदरता उसकी लचीलापन में है। उन्होंने बताया कि यह नृत्य मुगल काल के दौरान दरबारी नृत्य बन गया, लेकिन उसने अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। “मुगल शासन में कथक ने जो परिवर्तन देखे, उन्होंने उसे और समृद्ध बना दिया। तब यह नृत्य सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दरबारों में भी अपनी जगह बनाने लगा। इस परिवर्तन ने कथक को अभिव्यक्ति की नई भाषा दी,” उन्होंने कहा।

    शमा भाटे ने यह भी बताया कि महाराष्ट्र में कथक को स्थापित करना आसान नहीं था। यहां भरतनाट्यम और लावणी जैसी स्थानीय शैलियों का दबदबा था। “शुरुआत में लोग कथक को उत्तर भारत की कला मानते थे। लेकिन धीरे-धीरे हमने उसे महाराष्ट्र के सांस्कृतिक परिदृश्य में अपनी पहचान दिलाई। आज हमारे यहां कथक सीखने वाले हजारों विद्यार्थी हैं,” उन्होंने गर्व से कहा।

    उन्होंने इस अवसर पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार, कथक और संगीत का रिश्ता आत्मा और शरीर जैसा है। “कथक बिना संगीत अधूरा है। ताल, लय और भाव संगीत के सहारे ही जीवंत होते हैं। जब मैं नृत्य करती हूं, तो संगीत मेरी आत्मा की आवाज बन जाता है,” उन्होंने कहा।

    शमा भाटे का नृत्य सफर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। वे हाल ही में कनाडा के टोरंटो से लौटी हैं, जहां उन्होंने ‘कथक और बैले महोत्सव’ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस आयोजन में उन्होंने भारतीय नृत्य की परंपरा और पश्चिमी बैले के बीच तालमेल दिखाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

    अपनी 75 वर्ष की यात्रा के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनके लिए नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि साधना है। “मैं हर दिन नृत्य के जरिए खुद को खोजती हूं। कथक मेरे लिए ईश्वर से संवाद का माध्यम है। मैंने सीखा है कि यह नृत्य समय के साथ बदल सकता है, लेकिन इसकी आत्मा शाश्वत है,” उन्होंने कहा।

    आज शमा भाटे की शिष्याएं देश-विदेश में कथक सिखा रही हैं और इस परंपरा को नई दिशा दे रही हैं। उन्होंने बताया कि नई पीढ़ी के नर्तक आधुनिकता से प्रभावित हैं, लेकिन वे अगर अपने मूल को न भूलें, तो कथक हमेशा प्रासंगिक रहेगा।

    कला की दुनिया में सात दशकों से अधिक का योगदान देने वाली शमा भाटे आज भी मंच पर सक्रिय हैं। उनके नृत्य की गहराई, अभिव्यक्ति की शक्ति और ताल की सटीकता उन्हें भारतीय कथक परंपरा का जीवंत प्रतीक बनाती है। उन्होंने कहा — “कथक मेरे जीवन का श्वास है। मुगल दरबारों से लेकर आज के मंचों तक, इसने हर युग में खुद को नया रूप दिया है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।”

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