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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में संघ में शामिल होने के विषय पर महत्वपूर्ण और स्पष्ट टिप्पणी की है। भागवत ने कहा कि संघ में सभी का स्वागत है, लेकिन इसमें केवल उन लोगों को शामिल किया जा सकता है जो इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानते हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि किसी भी ब्राह्मण, मुसलमान, ईसाई या किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को संघ में शामिल नहीं किया जा सकता।
मोहन भागवत के अनुसार, संघ में शामिल होने के लिए केवल हिंदू ही पात्र हैं। उन्होंने ‘हिंदू’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि यह केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। उनके शब्दों में, “जो भी भारत का मूल निवासी है और इसे अपनी मातृभूमि मानता है, वह हिंदू है। यह एक व्यापक परिभाषा है जो सभी को समाहित करती है।” इसका मतलब है कि संघ में हिंदू होने का अर्थ केवल जन्म या धर्म से नहीं, बल्कि संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और भारत माता के प्रति निष्ठा से जुड़ा है।
भागवत ने आगे कहा कि संघ किसी भी व्यक्ति की विशेषताओं, पेशे या जाति का सम्मान करता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति संघ में शामिल होता है, तो उसे ‘भारत माता की संतान’ के रूप में एकजुट होकर काम करना चाहिए। यह विचार संघ की एकता और अखंडता की नींव को मजबूत करने के लिए जरूरी है।
इस संबंध में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ किसी धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता, लेकिन सदस्यता की साफ-सुथरी शर्त यह है कि सदस्य भारत को अपनी मातृभूमि माने और हिंदू सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को अपनाए।
मोहन भागवत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और उसकी सदस्यता को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन का विस्तार नहीं है, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाना है। संघ में शामिल होने वाले सभी सदस्य भारत माता के प्रति समर्पित और देश की संस्कृति का सम्मान करने वाले होने चाहिए।
उन्होंने यह भी उदाहरण देते हुए कहा कि संघ में विभिन्न सामाजिक वर्गों और जातियों के लोग शामिल हैं, लेकिन कोई भी धार्मिक रूप से हिंदू न होने वाला व्यक्ति संघ का सदस्य नहीं बन सकता। यह संघ की मूल पहचान और परंपरा का हिस्सा है।
भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ का दर्शन एकता और अखंडता पर आधारित है। इसलिए सभी सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे संघ के आदर्शों और उद्देश्यों का पालन करें। इस दृष्टिकोण में संघ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि सभी सदस्य भारत माता के प्रति समान निष्ठा और सम्मान रखें।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोहन भागवत ने संघ की सदस्यता और हिंदू पहचान के मुद्दे पर जो स्पष्टीकरण दिया है, वह संघ के मूल सिद्धांतों और व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करने वाला है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि संघ में शामिल होने का आधार केवल धर्म नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक निष्ठा भी है।
इस प्रकार, मोहन भागवत की टिप्पणी ने एक बार फिर संघ के दृष्टिकोण को साफ किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संघ में शामिल होने की शर्त केवल हिंदू होना है, लेकिन हिंदू की व्यापक व्याख्या केवल धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, मातृभूमि और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी हुई है।








