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अमरावती में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने भारतीय संविधान की शक्ति, लचीलापन और समय के साथ बदलने की इसकी क्षमता पर विस्तार से बात की। अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले दिए गए इस महत्वपूर्ण भाषण में उन्होंने संविधान को सिर्फ एक लिखित दस्तावेज नहीं, बल्कि एक गतिशील और जीवंत संरचना बताया, जिसने भारत को निरंतर प्रगतिशील बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सीजेआई गवई ने कहा कि भारतीय संविधान विश्व के सबसे व्यापक और लोकतांत्रिक दस्तावेजों में एक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह ‘जड़’ नहीं है, यानी यह समय के साथ परिस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता रखता है। यही क्षमता संविधान को विशेष बनाती है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि संविधान को कठोर और स्थिर कहा जाना गलत है, बल्कि इसकी संशोधन प्रक्रिया इसे हमेशा समयानुकूल बनाए रखती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि संविधान के चलते देश को अब तक तीन राष्ट्रपति मिले हैं, जो भारत की लोकतांत्रिक विविधता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को सच्चे रूप में दर्शाते हैं।
सीजेआई ने अपने संबोधन में कानून के छात्रों को विशेष संदेश देते हुए कहा कि उन्हें अनुच्छेद 368 अवश्य पढ़ना चाहिए। यह अनुच्छेद संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को निर्धारित करता है और बताता है कि किस प्रकार संसद समय के साथ संविधान के विभिन्न प्रावधानों को बदल या सुधार सकती है। उन्होंने छात्रों को यह भी बताया कि संविधान का अध्ययन केवल पढ़ने भर तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके प्रयोग, उसके विकास और उससे जुड़े न्यायिक फैसलों को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
इस अवसर पर उन्होंने क्रीमीलेयर की अवधारणा पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि समाज के पिछड़े तबकों को आगे लाने के लिए बनाए गए आरक्षण तंत्र में क्रीमीलेयर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब समान अवसर मिल जाएं और कोई परिवार एक निश्चित सामाजिक-आर्थिक स्तर तक पहुंच जाए, तो उसके लिए आरक्षण जारी रखना सामाजिक न्याय की मूल भावना के अनुरूप नहीं रहता। इस संदर्भ में उन्होंने कई ऐतिहासिक निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक रूप से प्रगतिशील हो चुके लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
अपने भाषण में सीजेआई गवई ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान ने हमेशा से न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा है। आज भी भारत का लोकतंत्र संविधान की इसी मजबूती के कारण विश्व में सबसे बड़ी और सफल लोकतांत्रिक प्रणालियों में गिना जाता है। उन्होंने कहा कि जब हम संविधान की बात करते हैं, तो हमें केवल अधिकारों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि कर्तव्यों पर भी उतना ही जोर देना चाहिए। राष्ट्र की प्रगति केवल कानून या अदालतों से ही नहीं, बल्कि नागरिकों की जिम्मेदारी निभाने से भी संभव होती है।
अमरावती में दिया गया यह संबोधन कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसमें देश के सर्वोच्च न्यायाधीश ने न केवल संविधान की मजबूती पर प्रकाश डाला, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों, खासकर कानून के छात्रों, को इसके अध्ययन और समझ को गंभीरता से लेने की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने कहा कि संविधान को समझना सिर्फ वकीलों या न्यायाधीशों के लिए नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए आवश्यक है, क्योंकि वही देश के भविष्य का आधार है।
सीजेआई बी.आर. गवई का यह वक्तव्य उस समय आया है जब देश में न्यायपालिका, संविधान संशोधन और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर लगातार बहस चल रही है। उनके विचारों ने इन सभी चर्चाओं को एक नई दिशा दी है और संविधान की जीवंतता को फिर से रेखांकित किया है।








