बिहार में नई सरकार के गठन के साथ ही मंत्रिमंडल की सूची जारी हो चुकी है, जिसमें कई पुराने और प्रभावशाली चेहरे इस बार शामिल नहीं किए गए। 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी इस नई सरकार में कुल 19 ऐसे नेता हैं, जो पिछली सरकार में मंत्री रहे थे, लेकिन अब उन्हें कैबिनेट बर्थ नहीं दिया गया। इनमें बीजेपी और जेडीयू दोनों के कई अनुभवी चेहरे शामिल हैं, जिनसे उम्मीद की जा रही थी कि उन्हें फिर से मंत्रिपद मिलेगा। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के बाद इन सभी की उम्मीदें निराशा में बदल गईं।
इन नेताओं में पहला बड़ा नाम है रेणु देवी का, जो कभी बिहार की उपमुख्यमंत्री रह चुकी हैं। पिछली सरकार में वे पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की मंत्री थीं और 2025 के चुनाव में उन्होंने बेतिया से लगातार छठी जीत दर्ज की। उनके समर्थकों को पूरी उम्मीद थी कि वे मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण स्थान पाएंगी, लेकिन अंतिम सूची में उनका नाम नहीं था। इसी तरह बीजेपी के नीतीश मिश्रा, जिन्होंने उद्योग विभाग को संभालकर राज्य में निवेश के नए अवसर बनाए, वे भी इस बार कैबिनेट में जगह नहीं बना पाए। जाले सीट से उनकी जीत के बावजूद उन्हें मंत्रिपद नहीं मिला।
बीजेपी के ही जीवेश कुमार, जो दरभंगा के जाले से लगातार तीसरी बार विधायक बने, उन्हें भी मंत्री पद से वंचित रखा गया। पिछली सरकार में श्रम संसाधन और सूचना प्रावैद्यिकी विभाग संभालने वाले जीवेश कुमार भी काफी आशान्वित थे। इसी कड़ी में गया शहर से नौ बार विधायक रहे प्रेम कुमार का नाम भी शामिल है। हालांकि इस बार उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, लेकिन सूत्रों के अनुसार उन्हें बिहार विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी मिल सकती है, जो कि अभी भी राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ा पद है।
नीरज सिंह बब्लू, जो अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक चेहरा हैं और सुपौल के छातापुर से विजयी हुए, उन्हें भी इस बार PHED विभाग की जिम्मेदारी से हटाकर बाहर कर दिया गया। सुशांत सिंह राजपूत के चचेरे भाई होने के कारण वे अक्सर सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन इस बार उनका नाम मंत्री सूची में शामिल नहीं हुआ। कुढ़नी से केदार प्रसाद गुप्ता, हरसिद्धि से कृष्णनंदन पासवान और सिकटी से विजय कुमार मंडल जैसे नेताओं की उम्मीदें भी धरी रह गईं, जबकि ये सभी पिछली सरकार में अहम विभाग संभाल रहे थे।
अमनौर से विधायक कृष्ण कुमार मंटू, जो पिछली सरकार में आईटी मंत्री थे, इस बार भी मंत्री बनने की उम्मीद में थे, लेकिन वे भी सूची से बाहर रहे। इसी तरह संजय सरावगी, जो बीजेपी के कद्दावर नेताओं में गिने जाते हैं और दरभंगा से लगातार छठी बार विधायक बने, वे भी नई सूची में नजर नहीं आए। भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने के बावजूद उन्हें इस बार मंत्रिपद नहीं मिल पाया।
साहेबगंज के विधायक राजू कुमार सिंह, जिनका नाम 2019 के एक विवादित मामले में सामने आया था, उन्हें भी इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। वहीं जेडीयू के महेश्वर हजारी, जो सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री थे, उन्हें अपने बेटे को कांग्रेस टिकट दिलाने की वजह से पार्टी की नाराज़गी का सामना करना पड़ा और उन्हें भी कैबिनेट से बाहर कर दिया गया। बीजेपी के डॉ. सुनील कुमार, संतोष सिंह, जनक राम और हरि सहनी जैसे नेताओं को भी इस बार मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया।
जेडीयू के रत्नेश सदा, जो पिछली सरकार में मद्य निषेध मंत्री थे, और अमरपुर के विधायक जयंत राज, जिन्होंने ग्रामीण कार्य विभाग संभाला था, उनका नाम भी कैबिनेट में नहीं आया। इन दोनों के नाम पहले से ही ‘ड्रॉप लिस्ट’ में बताए जा रहे थे और अंततः ऐसा ही हुआ।
इन 19 नेताओं का मंत्रिमंडल से बाहर रह जाना बिहार की राजनीति में नए समीकरणों और सत्ता संतुलन का संकेत देता है। नीतीश कुमार और गठबंधन की नई रणनीति के तहत नए चेहरों और नई ऊर्जा को प्राथमिकता देने का संदेश इस सूची में स्पष्ट दिखता है। आने वाले समय में यह तय होगा कि इन वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक भूमिका क्या दिशा लेती है।








