• Create News
  • ▶ Play Radio
  • शब्दों में बंधी पितृसत्ता: क्यों जरूरी है बराबरी की भाषा?

    इस खबर को सुनने के लिये प्ले बटन को दबाएं।

    समाज में पितृसत्ता की जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही मजबूती से यह भाषा में भी दिखाई देती हैं। शब्दों का चयन, संबोधन, वाक्य संरचनाएं—ये सभी मिलकर एक ऐसी व्यवस्था को कायम रखते आए हैं, जिसमें महिलाओं को या तो कमतर दिखाया गया है या फिर पूरी तरह अदृश्य बना दिया गया है। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक ताकतों और सत्ता संरचनाओं का आईना है। हाल ही में इसी बहस को नई ऊर्जा मिली जब वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम्स 3’ में पात्र वर्तिका चतुर्वेदी (शेफाली शाह) को स्टाफ ‘मैडम सर’ कहकर संबोधित करता है। यह संबोधन सुनने में भले हल्का लगे, लेकिन इसके भीतर वह पूरा जेंडर-भाषा-सत्ता का समीकरण छिपा है जिसे समाज सदियों से ढोता आ रहा है।

    लंबे समय तक भाषा को निष्पक्ष माना जाता रहा, लेकिन अब यह विचार तेजी से बदल रहा है। भाषा समाज की सोच, परंपराओं और पितृसत्तात्मक धारणाओं को न केवल प्रतिबिंबित करती है, बल्कि उन्हें मजबूत भी करती है। उदाहरण के लिए, जब हम ‘सर’ को सम्मान और अधिकार का प्रतीक मानते हुए इस्तेमाल करते हैं, तो ‘मैडम’ अपने आप में एक कमज़ोर स्वरूप की तरह सामने आता है। यह फर्क सिर्फ संबोधन तक सीमित नहीं, बल्कि मानसिकता को भी परिलक्षित करता है। यही कारण है कि जब किसी महिला अधिकारी को ‘मैडम सर’ कहा जाता है, तो यह दो विरोधाभासी पहचानों के बीच फंसे समाज की मनःस्थिति को उजागर करता है।

    पितृसत्तात्मक समाज में भाषा हमेशा पुरुष केंद्रित रही है। पारंपरिक कहावतें, मुहावरे, लोकगीत और रोज़मर्रा के संवाद—इन सभी में महिलाओं को कमतर, कमजोर या पुरुष के अधीन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। “औरत जात”, “लड़की पराया धन”, “नारी का अपना घर ससुराल”—ये ऐसे वाक्य हैं जो पीढ़ियों से समाज में गूंजते आए हैं और लैंगिक असमानता को वैधता देते रहे हैं। यही वजह है कि भाषा बदलना केवल शब्द बदलना नहीं, बल्कि सोच बदलने की दिशा में निर्णायक कदम है।

    समकालीन समय में महिलाएं हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। पुलिस, सेना, न्यायपालिका, विज्ञान, खेल, राजनीति—कोई भी क्षेत्र अब महिलाओं के लिए सीमित नहीं रहा। लेकिन इन नए किरदारों और पदों के लिए भाषा अभी तक नए संबोधन नहीं गढ़ पाई है। महिलाएं तो आगे बढ़ रही हैं, पर भाषा अभी भी वही पुरानी मानसिकता का बोझ ढो रही है जो सदियों से बनी हुई है। इसी असमानता को ‘मैडम सर’ जैसे शब्द और भी स्पष्ट कर देते हैं।

    भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय भाषाई बदलाव का है। जैसे जब समाज में नए विचार घुसते हैं, तो भाषा में नई शब्दावली पैदा होती है। लेकिन जेंडर समानता के मामले में भाषा का विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा है। इसका कारण उस मानसिक ढांचे में है, जहां पुरुष को अधिकार और महिला को पालनहार या अनुचर की भूमिका में देखा जाता है। यह ठीक वही बात है जो कहावत “भाषा भेद खोलती है” को सच साबित करती है। समाज में जो भेदभाव मौजूद होता है, वह भाषा में भी बखूबी झलकता है।

    आज जरूरत है कि भाषा को अधिक संवेदनशील और समानता पर आधारित बनाया जाए। यह केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए जरूरी है। बराबरी की भाषा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद को मजबूत करती है और यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने लिंग के आधार पर अदृश्य, खारिज या कमतर महसूस न करे। भाषा में बदलाव धीरे-धीरे आता है, लेकिन यह बदलाव शुरुआत से ही संभव है—सही शब्द चुनकर, सही संबोधन गढ़कर, और उन पुराने भाषाई ढांचों को चुनौती देकर जो असमानता को कायम रखते हैं।

    सामाजिक बदलाव की यात्रा भाषा से होकर ही गुजरती है। जैसे-जैसे महिलाएं नई भूमिकाएं निभा रही हैं, वैसे-वैसे समाज को भी नए शब्दों और नई सोच की आवश्यकता है। जब भाषा में बराबरी आएगी, तब समाज में भी बराबरी को सही अर्थों में जगह मिल सकेगी।

  • Related Posts

    संगरिया: ग्रामोत्थान विद्यापीठ में छात्रवृत्ति वितरण समारोह, डॉ. बी.एस. वर्मा ने विद्यार्थियों को किया सम्मानित

    इस खबर को सुनने के लिये प्ले बटन को दबाएं। राजेश चौधरी | हनुमानगढ़ | समाचार वाणी न्यूज़ संगरिया स्थित ग्रामोत्थान विद्यापीठ में स्वामी केशवानंद स्मृति चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान…

    Continue reading
    नोहर हनुमानगढ़: व्यवस्थापकों की हड़ताल समाप्त, कल से एमएसपी पर फसल खरीद शुरू

    इस खबर को सुनने के लिये प्ले बटन को दबाएं। राजेश चौधरी | हनुमानगढ़ | समाचार वाणी न्यूज़ तहसील नोहर, जिला हनुमानगढ़ में क्रय-विक्रय सहकारी समिति के व्यवस्थापकों की सामूहिक…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *