अयोध्या के भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में 25 नवंबर को आयोजित होने वाले ध्वजारोहण समारोह का राजनीतिक, धार्मिक और तकनीकी महत्व लगातार बढ़ रहा है। इस ऐतिहासिक पल के लिए मंदिर की ट्रस्ट समिति ने ‘धर्मध्वजा’ या ‘सूर्य ध्वज’ तैयार किया था, लेकिन रक्षा मंत्रालय की सलाह के बाद इसे वापस लौटाना पड़ा और अब एक नया झंडा तैयार किया जा रहा है। इस बदलाव के पीछे सेना की सुरक्षा और तकनीकी विशेषज्ञता अहम भूमिका निभा रही है।
मंदिर ट्रस्ट के नृपेंद्र मिश्रा ने बताया है कि प्रारंभ में ध्वजा का वजन करीब 11 किलोग्राम निर्धारित किया गया था, और यह भारी पैराशूट फैब्रिक से बनाई गई थी। लेकिन अभ्यास और परीक्षण के दौरान रस्सी टूटने जैसी समस्या सामने आई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस भारी झंडे का शिखर पर लंबे समय तक सुरक्षित रूप से रखना चुनौतीपूर्ण होगा। वहीं रक्षा मंत्रालय ने सुझाव दिया कि झंडे का वजन लगभग 2.5 किलो होना चाहिए, जिससे उसे फहराना और संभालना आसानी से संभव हो सके।
नया ध्वज नायलॉन-रेशम मिश्रित पॉलीमर से बनाया गया है, जो हल्का होने के साथ-साथ मजबूत और टिकाऊ भी है। इस बदलाव को मंदिर ट्रस्ट ने स्वीकार कर लिया और दोबारा झंडा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई। उसी उद्देश्य के लिए भारतीय सेना को शामिल किया गया है, जो फहराने की रिहर्सल कर रही है और तकनीकी सुझाव दे रही है।
सेना द्वारा इस तरफ़ कदम उठाने का प्रमुख कारण यह है कि झंडा मंदिर के लगभग 190 फुट ऊंचे शिखर पर लगाया जाएगा। यही वजह है कि ट्रस्ट ने सेना की विशेषज्ञता और अनुभव को ध्यान में रखते हुए मदद मांगी है। वरिष्ठ अधिकारियों की अगुवाई में सेना ने रिहर्सल भी की है ताकि झंडा स्थापना समारोह त्रुटिहीन हो सके।
रक्षा मंत्रालय ने विशेष रूप से ध्वज की लंबाई, चौड़ाई और हवादार स्थिति में उसकी पकड़ पर ध्यान देने को कहा। मंत्रालय के विशेषज्ञों ने समीक्षा में सुझाव दिया कि झंडे में उपयोग किए जाने वाले कपड़े को हल्का और टिकाऊ होना चाहिए, ताकि हवा के झोंकों के बीच भी झंडा फहराने की प्रक्रिया सुरक्षित बनी रहे।
धर्मध्वजा सिर्फ एक प्रतीकात्मक झंडा नहीं है, बल्कि यह राम मंदिर के निर्माण की पूर्णता, भक्तों की आस्था और लंबे समय से प्रतीक्षित धार्मिक लक्ष्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इसका शीर्ष शिखर पर稳तापूर्वक फहराया जाना बेहद महत्वपूर्ण है — न सिर्फ धार्मिक, बल्कि सांप्रदायिक और सामाजिक दृष्टि से भी।
इसके अलावा झंडे के डिज़ाइन में धार्मिक चिन्हों को भी शामिल किया गया है, जैसे कि सूर्यवंश (सूर्य चिह्न) और कोविदर वृक्ष, जो अयोध्या की प्राचीन पहचान और भगवान राम की वंशावली का प्रतीक है।
इस प्रकार, रक्षा मंत्रालय का सुझाव और भारतीय सेना की भागीदारी केवल सुरक्षा की दृष्टि से नहीं, बल्कि तकनीकी और धार्मिक समरसता को बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि 25 नवंबर का यह पवित्र अनुष्ठान त्रुटिहीन और गरिमापूर्ण रूप से हो, और झंडे की स्थापना एक ऐतिहासिक क्षण बने।








