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भारतीय रुपया ने गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर — लगभग ₹92 प्रति डॉलर — को छू लिया, जो आर्थिक और वैश्विक बाजार के लिए चिंता का संकेत माना जा रहा है। यह गिरावट पिछले रिकॉर्ड वाले स्तर 91.9650 को पार करने के बाद आई है, और कई विदेशी मुद्रा बाजारों में ये सबसे कमजोर स्थिति के रूप में दर्ज हुई है।
रुपए में यह कमजोरी कई आर्थिक और वैश्विक कारणों से आई है। घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत रहने के बावजूद रुपया दबाव में रहा, क्योंकि विदेशी पूंजी बाजार से निकासी (foreign outflows) जारी रही और कंपनियों ने पूंजी जोखिम से बचने के लिए डॉलर की मांग बढ़ा दी। इसके अलावा अक्टूबर‑2025 से अमेरिकी उच्च टैरिफ नीति के कारण भारत के निर्यात पर प्रभाव पड़ा, जिससे डॉलर‑रुपया विनिमय दर पर और दबाव बन गया है।
क्यों गिर रहा है रुपया?
विश्लेषकों के अनुसार इस गिरावट के प्रमुख कारण हैं:
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विदेशी पूंजी की लगातार निकासी (FII/FPIs आउटफ्लो), जो रुपये पर दबाव बढ़ाती है।
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डॉलर की वैश्विक मजबूती और जोखिम‑अनिश्चितता की वजह से निवेशक सुरक्षित मुद्रा की ओर रुख कर रहे हैं।
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बढ़ती तेल की कीमतें और आयातकों की बढ़ी हुई डॉलर मांग से रुपये के संतुलन में कमी आई।
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RBI (भारतीय रिज़र्व बैंक) ने सीमित हस्तक्षेप किया है, जिससे बाजार में रुपया कमजोर बना रहा।
घरेलू बाजार पर असर
रुपये की गिरावट का असर शेयर बाजारों पर भी देखा गया है। प्रमुख संकेतक सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट दर्ज की गई, जो निवेशकों की बढती सावधानी और डॉलर‑मांग की प्रतिक्रिया मानी जा रही है।
अर्थशास्त्रियों का मानना
आर्थिक सर्वे और विशेषज्ञ रिपोर्टों के अनुसार, इस तरह की मुद्रा गिरावट केवल घरेलू आर्थिक कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार और भू‑राजनीतिक जोखिमों का भी बड़ा प्रभाव रहा है। रुपए की कमजोरी को वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भारत‑अन्य देशों के आर्थिक समीकरणों के बीच संतुलन की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।








