इस खबर को सुनने के लिये प्ले बटन को दबाएं।

श्रीलंका ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णय लेते हुए अमेरिका के उस अनुरोध को ठुकरा दिया है, जिसमें अमेरिकी युद्धक विमानों को अपने क्षेत्र में उतरने और संचालन के लिए जमीन उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। यह खुलासा स्वयं श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में किया। उनके इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है और हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद में बोलते हुए स्पष्ट किया कि श्रीलंका अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है और किसी भी बड़े सैन्य गठबंधन या बाहरी दबाव के आधार पर फैसले नहीं लेता। उन्होंने कहा कि देश की संप्रभुता और तटस्थता बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसीलिए अमेरिका के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया गया।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में। इस क्षेत्र को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और व्यापारिक माल की आवाजाही होती है। ऐसे में किसी भी देश का यहां सैन्य उपस्थिति बढ़ाना वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने श्रीलंका से अनुरोध किया था कि वह अपने कुछ युद्धक विमानों को अस्थायी रूप से श्रीलंका के एयरबेस पर तैनात करने की अनुमति दे। यह अनुरोध क्षेत्रीय सुरक्षा और संभावित सैन्य अभियानों के मद्देनजर किया गया था। हालांकि, श्रीलंका सरकार ने इस प्रस्ताव को अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मानते हुए अस्वीकार कर दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि श्रीलंका का यह कदम उसकी “नॉन-अलाइनमेंट” यानी गुटनिरपेक्ष नीति को दर्शाता है। श्रीलंका लंबे समय से बड़े वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। एक ओर जहां वह भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंध बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ भी आर्थिक और कूटनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश करता है।
राष्ट्रपति दिसानायके ने यह भी कहा कि श्रीलंका किसी भी देश को अपने क्षेत्र का उपयोग सैन्य गतिविधियों के लिए करने की अनुमति नहीं देगा, जब तक कि वह पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों के अनुरूप न हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश किसी भी तरह के सैन्य संघर्ष का हिस्सा नहीं बनना चाहता और शांति तथा स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस फैसले का असर अमेरिका-श्रीलंका संबंधों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच लंबे समय से कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग रहा है, लेकिन इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर असहमति संबंधों में थोड़ी दूरी पैदा कर सकती है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है और दोनों देश भविष्य में आपसी संवाद के जरिए इस अंतर को कम कर सकते हैं।
दूसरी ओर, इस फैसले को क्षेत्रीय राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी और उसके बंदरगाह परियोजनाओं के चलते अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता बढ़ी है। ऐसे में अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाना चाहता है।
श्रीलंका पहले ही चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा रहा है और उसने कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चीनी निवेश स्वीकार किया है। ऐसे में अमेरिका के अनुरोध को ठुकराने को कुछ विशेषज्ञ चीन के प्रभाव से जोड़कर भी देख रहे हैं, हालांकि श्रीलंका सरकार ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यह फैसला पूरी तरह से स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
इस घटनाक्रम के बाद भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत लंबे समय से श्रीलंका के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करता आया है। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह इस क्षेत्र में संतुलन बनाए रखे और किसी भी बाहरी शक्ति के अत्यधिक प्रभाव को सीमित करे।
कुल मिलाकर, श्रीलंका का यह फैसला न केवल उसकी स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि छोटे देश भी वैश्विक मंच पर अपने हितों की रक्षा के लिए बड़े निर्णय लेने में सक्षम हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका इस फैसले पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कोई नया समझौता या बातचीत होती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है और छोटे देशों की भूमिका भी इसमें उतनी ही अहम होती है जितनी बड़ी शक्तियों की।








