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  • ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते पर जिनेवा में होंगे हस्ताक्षर, मेजबानी पाकिस्तान करेगा, लेकिन समारोह इस्लामाबाद से दूर

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    ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में होने जा रहे हैं। इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक कार्यक्रम की मेजबानी पाकिस्तान करेगा, लेकिन समारोह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के बजाय जिनेवा में आयोजित किया जाएगा। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    जानकारी के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजेशकियान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी की संभावना जताई जा रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस आयोजन की मेजबानी की पुष्टि की है।

    इस्लामाबाद नहीं, जिनेवा क्यों?

    हालांकि प्रारंभिक दौर की बातचीत पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई थी, लेकिन अंतिम समझौते के लिए जिनेवा को चुना गया। इसके पीछे कई अहम कारण बताए जा रहे हैं।

    1. ईरान का कूटनीतिक संदेश

    विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान चाहता था कि समझौते पर हस्ताक्षर उसी शहर में हों, जहां युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता प्रस्तावित थी। जिनेवा में बातचीत अधूरी रह गई थी और उसके बाद सैन्य तनाव बढ़ गया था। अब ईरान यह संदेश देना चाहता है कि अमेरिका को अंततः वार्ता की मेज पर लौटना पड़ा।

    2. शांति वार्ताओं का वैश्विक केंद्र

    जिनेवा को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय शांति और कूटनीति का केंद्र माना जाता है। इतिहास में कई महत्वपूर्ण समझौते इसी शहर में संपन्न हुए हैं। जिनेवा संधियों और युद्धकालीन मानवीय कानूनों के कारण भी यह शहर विश्व राजनीति में विशेष महत्व रखता है। यही वजह है कि इसे अक्सर “शांति की राजधानी” कहा जाता है।

    3. सुरक्षा सबसे बड़ा कारण

    समारोह में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शामिल होने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए जिनेवा जैसी उच्च सुरक्षा वाली जगह अधिक उपयुक्त मानी जाती है। पाकिस्तान में आखिरी बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा वर्ष 2006 में हुई थी, जब जॉर्ज डब्ल्यू. बुश इस्लामाबाद पहुंचे थे।

    समझौते में क्या-क्या शामिल?

    सूत्रों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच 14 बिंदुओं वाला एक अस्थायी समझौता तैयार किया गया है।

    समझौते के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं—

    • अमेरिका ईरान पर सैन्य हमला नहीं करेगा।
    • ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखेगा।
    • ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर आगे बातचीत होगी।
    • ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता दोहराएगा।
    • ईरान पर लगाए गए कई आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएंगे।
    • विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मुक्त किया जाएगा।
    • ईरान को आर्थिक राहत पैकेज के तहत लगभग 300 अरब डॉलर तक की सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।

    इजराइल की आपत्ति बरकरार

    हालांकि इस प्रस्तावित समझौते को लेकर इजराइल ने आपत्ति जताई है। इजराइल का कहना है कि क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर अभी स्पष्टता नहीं है और वह लेबनान में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखेगा।

    वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा असर

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो मध्य पूर्व में तनाव कम हो सकता है, वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिरता मिल सकती है और ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलने की संभावना है। वहीं पाकिस्तान के लिए भी यह कूटनीतिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि वह इस ऐतिहासिक समझौते की मेजबानी करने जा रहा है।

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