राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और दान प्रबंधन को लेकर उठे विवाद के बीच राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने पहली बार पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी बात रखी है। उन्होंने बताया कि पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब काउंटिंग रूम के पास स्थित टॉयलेट के निकट कुछ रुपये पड़े मिले। इसी छोटी-सी घटना ने बड़े वित्तीय अनियमितता की आशंका को जन्म दिया और उसके बाद जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।
नृपेंद्र मिश्रा ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि काउंटिंग रूम के समीप स्थित टॉयलेट के पास कुछ नकदी बरामद हुई है। यह जानकारी तत्काल श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय तक पहुंचाई गई। सूचना मिलते ही चंपत राय लगभग आधे घंटे के भीतर मौके पर पहुंचे और पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच शुरू कराई। बाद में ट्रस्ट ने निष्पक्ष जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का अनुरोध किया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि दान प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया पहले से निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है। इसमें बैंक, ट्रस्ट और काउंटिंग टीम सहित सभी की जिम्मेदारियां तय रहती हैं। यहां तक कि काउंटिंग करने वाले कर्मचारियों के कपड़ों में जेब तक नहीं रखने का नियम बनाया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना समाप्त हो सके।
चंपत राय पर उठ रहे सवालों को लेकर नृपेंद्र मिश्रा ने उनका बचाव करते हुए कहा कि वह वर्षों से राम मंदिर आंदोलन का हिस्सा रहे हैं और अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना कर चुके हैं। उनके अनुसार केवल ट्रस्ट के महासचिव होने के कारण उन पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उन्हें सीधे तौर पर दोषी नहीं माना जा सकता।
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि निगरानी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। मिश्रा के अनुसार मंदिर परिसर में लगभग 800 सीसीटीवी कैमरे स्थापित हैं और उनका संचालन एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से किया जाता है। इसके बावजूद यदि चोरी जैसी घटना सामने आई है तो यह निगरानी व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है। उनका मानना है कि यदि कैमरों की निगरानी अधिक प्रभावी होती तो ऐसी स्थिति पहले ही पकड़ी जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि केवल कैमरे लगाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनकी सतत और गंभीर निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है। यदि काउंटिंग रूम में लगे कैमरों की फुटेज से घटना सामने आई है तो इसका अर्थ यह भी है कि निगरानी तंत्र में कहीं न कहीं कमी रही है, जिसे अब दूर किया जाना चाहिए।
बातचीत के दौरान नृपेंद्र मिश्रा ने राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा की गई जमीन खरीद को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने माना कि भूमि खरीद की प्रक्रिया में अपेक्षित पारदर्शिता नहीं बरती गई थी। उनके अनुसार यह ट्रस्ट के लिए पहली चेतावनी थी और अब दूसरा विवाद सामने आने के बाद भविष्य में और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि अयोध्या में अधिकांश भूमि नजूल श्रेणी की होने के कारण खरीद प्रक्रिया पहले से ही जटिल होती है। कई बार वास्तविक उपयोगकर्ता और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज स्वामित्व अलग-अलग होता है, जिससे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया कठिन हो जाती है। इसके बावजूद उन्होंने स्वीकार किया कि पूरी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता था।
नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि यह घटनाक्रम ट्रस्ट के लिए एक सीख है और भविष्य में जमीन खरीद से लेकर दान प्रबंधन तक प्रत्येक प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी। उनका मानना है कि धार्मिक संस्थानों में श्रद्धालुओं का विश्वास सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए और किसी भी प्रकार की लापरवाही उस विश्वास को प्रभावित कर सकती है।
फिलहाल इस पूरे मामले की जांच SIT कर रही है और जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सभी तथ्यों की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। वहीं, राम मंदिर ट्रस्ट ने भी भरोसा दिलाया है कि दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और श्रद्धालुओं का विश्वास पूरी तरह कायम रहे।







