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  • Zeenat Aman: फैशन आइकन से बेबाक सोच तक, आखिर क्यों किसी मजहब को नहीं मानतीं ज़ीनत अमान?

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    हिंदी सिनेमा की सबसे ग्लैमरस और बोल्ड अभिनेत्रियों में शुमार ज़ीनत अमान ने हाल ही में अपने निजी जीवन को लेकर एक ऐसा खुलासा किया, जिसने उनके प्रशंसकों का ध्यान खींच लिया। 74 वर्ष की उम्र में उन्होंने कहा कि वह किसी भी धर्म या मजहब को नहीं मानतीं। इसके साथ ही उन्होंने पहली बार अपने बचपन, हिंदू मां और अपने मूल नाम ललितेश्वरी के बारे में भी खुलकर बात की।

    ज़ीनत अमान का यह बयान केवल उनकी व्यक्तिगत सोच को ही नहीं दर्शाता, बल्कि उनके पूरे जीवन और करियर की उस स्वतंत्र विचारधारा को भी सामने लाता है, जिसने उन्हें अपने दौर की सबसे अलग और प्रभावशाली अभिनेत्री बनाया।

    बचपन से मिला विविध संस्कृतियों का अनुभव

    ज़ीनत अमान का जन्म मुंबई में हुआ, जहां उन्हें बचपन से ही विविध सांस्कृतिक परिवेश मिला। उनके पिता अमानुल्लाह खान हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध पटकथा लेखक थे, जिन्होंने ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ की पटकथा लिखी थी। वहीं उनकी मां हिंदू थीं और धार्मिक आस्था रखती थीं।

    बाद में उनकी मां ने एक जर्मन नागरिक से विवाह किया, जिसके बाद ज़ीनत को पश्चिमी सोच और अंतरराष्ट्रीय वातावरण का भी अनुभव मिला। यही मिश्रित पारिवारिक माहौल उनके व्यक्तित्व और विचारों को पारंपरिक धार्मिक सीमाओं से अलग दिशा देता गया।

    शिक्षा और मॉडलिंग ने बदली सोच

    ज़ीनत अमान ने अपनी आगे की पढ़ाई अमेरिका के लॉस एंजिल्स में की। वहां उन्हें आधुनिक शिक्षा और वैश्विक सोच का अनुभव मिला। इसी दौरान उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा और बाद में फेमिना मिस इंडिया तथा मिस एशिया पैसिफिक इंटरनेशनल का खिताब जीतकर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई।

    इस उपलब्धि ने उनके फिल्मी करियर के लिए नए रास्ते खोले और वह हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं।

    शुरुआत से ही चुने अलग किरदार

    ज़ीनत अमान ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत अंग्रेजी फिल्म ‘The Evil Within’ (1970) से की, जिसमें उनके साथ देव आनंद नजर आए थे। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी पारंपरिक नायिका की छवि से हटकर ऐसे किरदार चुने, जिन्होंने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

    ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में “दम मारो दम” गीत पर उनकी प्रस्तुति ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। हिप्पी संस्कृति पर आधारित इस किरदार ने उस दौर में बॉलीवुड की पारंपरिक छवि को बदलकर रख दिया।

    ग्लैमर और अभिनय दोनों में बनाई अलग पहचान

    ज़ीनत अमान ने अपने करियर में कई ऐसे किरदार निभाए जो उस समय काफी साहसिक माने जाते थे।

    ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में उन्होंने एक शिवभक्त युवती का संवेदनशील किरदार निभाया, जबकि ‘कुर्बानी’, ‘यादों की बारात’, ‘डॉन’, ‘दोस्ताना’, ‘द ग्रेट गैम्बलर’, ‘इंसाफ का तराजू’ और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों में उनके ग्लैमरस और दमदार अभिनय ने उन्हें बॉलीवुड की फैशन आइकन बना दिया।

    उनके पहनावे, आत्मविश्वास और स्क्रीन प्रेजेंस ने भारतीय सिनेमा में महिलाओं की आधुनिक छवि को नई पहचान दी।

    धर्म से अधिक इंसानियत और स्वतंत्र सोच

    ज़ीनत अमान का कहना है कि उनके जीवन में किसी एक धर्म की बजाय इंसानियत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिक महत्वपूर्ण रही है। अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश में पली-बढ़ीं ज़ीनत ने अपने जीवन में धार्मिक पहचान की अपेक्षा व्यक्तिगत मूल्यों और पेशेवर प्रतिबद्धता को प्राथमिकता दी।

    उनकी यही सोच उनके जीवन और फिल्मों दोनों में साफ दिखाई देती है, जहां उन्होंने हमेशा सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाले किरदारों को चुना।

    आज भी कायम है अलग पहचान

    सत्तर और अस्सी के दशक में जिस तरह ज़ीनत अमान ने फैशन, ग्लैमर और अभिनय के नए मानक स्थापित किए, उसका प्रभाव आज भी बॉलीवुड में दिखाई देता है। आधुनिक सोच, आत्मविश्वास और बेबाक व्यक्तित्व के कारण वह आज भी नई पीढ़ी की अभिनेत्रियों के लिए प्रेरणा मानी जाती हैं।

    धर्म को लेकर दिया गया उनका हालिया बयान भी इसी स्वतंत्र सोच का विस्तार माना जा रहा है, जिसने उन्हें केवल एक सफल अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि अपने समय की सबसे अलग और प्रगतिशील शख्सियतों में शामिल कर दिया।

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