देशभर की खाद्य कंपनियों के लिए 1 जुलाई 2026 से बड़ा बदलाव लागू होने जा रहा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग, लेबल और प्रचार सामग्री पर “100%”, “100% Pure” और इसी तरह के पूर्ण दावे (Absolute Claims) करने पर रोक लगाने का फैसला किया है।
FSSAI का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य उपभोक्ताओं को भ्रामक विज्ञापनों और गलत दावों से बचाना है। हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि इस फैसले से कंपनियों को पैकेजिंग बदलने, पुराने स्टॉक हटाने और नए लेबल तैयार करने में करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
क्यों लगाया गया प्रतिबंध?
FSSAI के अनुसार, “100 प्रतिशत शुद्ध” या “100%” जैसे दावे कई बार उपभोक्ताओं को भ्रमित करते हैं, क्योंकि इन दावों का वैज्ञानिक आधार या स्पष्ट मानक हर उत्पाद पर लागू नहीं होता।
नए नियम के तहत कंपनियों को ऐसे दावों के बजाय प्रमाणित और सत्यापित जानकारी के आधार पर अपने उत्पादों का प्रचार करना होगा।
कंपनियों के लिए क्यों बढ़ी चुनौती?
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी एक शब्द को पैकेजिंग से हटाना जितना आसान दिखता है, वास्तविकता में प्रक्रिया उससे कहीं अधिक जटिल होती है।
एक मध्यम आकार की खाद्य कंपनी के पास 200 से 500 तक अलग-अलग उत्पाद (SKU) होते हैं। हर पैक का डिजाइन बदलना, नई पैकेजिंग छपवाना, कानूनी और नियामकीय मंजूरी लेना तथा पुराना स्टॉक हटाना एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है।
कई कंपनियों के पास पहले से छपी हुई लाखों पैकेजिंग सामग्री और बाजार में मौजूद तैयार स्टॉक भी है, जिसे या तो जल्दी बेचना होगा या फिर वापस लेकर बदलना पड़ेगा।
करोड़ों रुपये का हो सकता है नुकसान
रेगुलेटरी विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक लागत केवल नई पैकेजिंग तक सीमित नहीं रहती।
इसमें पुराने स्टॉक का नुकसान, नई प्रिंटिंग, लॉजिस्टिक्स, इन्वेंट्री प्रबंधन, कानूनी सलाह, सप्लाई चेन में बदलाव और प्रबंधन का अतिरिक्त समय भी शामिल होता है।
इसी कारण कई कंपनियों के लिए यह बदलाव करोड़ों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ बन सकता है।
हर साल तय होगी लागू होने की तारीख
FSSAI ने जनवरी 2025 में यह व्यवस्था भी लागू की थी कि लेबलिंग नियमों में किए जाने वाले संशोधन हर वर्ष 1 जुलाई से प्रभावी होंगे।
साथ ही किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले कम से कम 180 दिन का संक्रमणकाल (Transition Period) दिया जाएगा, ताकि कंपनियों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सके।
उद्योग जगत का मानना है कि तय समय-सारिणी होने से कंपनियां पैकेजिंग और उत्पादन की बेहतर योजना बना सकेंगी।
छोटे उद्योगों पर अधिक असर
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लगभग 98 प्रतिशत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सूक्ष्म और लघु श्रेणी के हैं।
इन कंपनियों के पास न तो बड़े कानूनी विभाग होते हैं और न ही पर्याप्त कार्यशील पूंजी। ऐसे में बार-बार होने वाले नियामकीय बदलाव उनके लिए आर्थिक और परिचालन दोनों स्तरों पर चुनौती बन जाते हैं।
उपभोक्ताओं को होगा क्या फायदा?
FSSAI का मानना है कि इस फैसले से बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को उत्पादों के बारे में अधिक स्पष्ट और तथ्यात्मक जानकारी मिलेगी।
विशेषज्ञों का भी कहना है कि भविष्य में कंपनियां “100% शुद्ध” जैसे व्यापक दावों के बजाय वैज्ञानिक प्रमाणों और गुणवत्ता मानकों के आधार पर अपने उत्पादों की विशेषताएं बताएंगी, जिससे ग्राहकों का भरोसा भी मजबूत होगा।
उद्योग ने क्या मांग की?
खाद्य उद्योग से जुड़े कई विशेषज्ञों ने FSSAI के फैसले का स्वागत करते हुए सरकार से यह भी आग्रह किया है कि ऐसे नियम लागू करते समय छोटे उद्योगों की आर्थिक स्थिति और अनुपालन लागत का भी विस्तृत आकलन किया जाए।
उनका कहना है कि उपभोक्ता हितों की रक्षा जरूरी है, लेकिन नियमों को इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि उद्योगों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव न पड़े।
1 जुलाई से लागू होने वाले इस नए नियम के साथ अब खाद्य कंपनियों को अपनी पैकेजिंग और मार्केटिंग रणनीति में बड़े बदलाव करने होंगे। आने वाले दिनों में इसका असर बाजार, ब्रांडिंग और उपभोक्ताओं की खरीदारी पर भी देखने को मिल सकता है।








