अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) अपनी जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि मामले में दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। इसी बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के मामलों में सरकार की भूमिका कितनी है और क्या वह सीधे हस्तक्षेप कर सकती है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राम मंदिर ट्रस्ट की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार द्वारा की गई थी और इसे एक स्वतंत्र एवं स्वायत्त न्यास का दर्जा प्राप्त है।
क्या है राम मंदिर ट्रस्ट?
5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अधिसूचना जारी कर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि यह एक स्वतंत्र ट्रस्ट होगा, जो मंदिर निर्माण, संचालन और प्रबंधन से जुड़े सभी निर्णय स्वयं लेने के लिए अधिकृत रहेगा।
ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य शामिल हैं। इसमें धार्मिक संतों के साथ केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि तथा अयोध्या के जिलाधिकारी भी सदस्य हैं। महंत नृत्यगोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष और चंपत राय को महासचिव बनाया गया था।
ट्रस्ट के संचालन के लिए क्या हैं नियम?
राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के समय उसके संचालन को लेकर कई महत्वपूर्ण नियम तय किए गए थे।
- ट्रस्ट के 15 सदस्य मंदिर निर्माण, प्रबंधन और वित्तीय व्यवस्था की निगरानी करेंगे।
- ट्रस्ट के सदस्यों को वेतन नहीं दिया जाएगा, हालांकि आधिकारिक कार्यों के लिए यात्रा भत्ता दिया जा सकता है।
- ट्रस्ट की अचल संपत्ति को कोई सदस्य बेच नहीं सकता।
- मंदिर में मिलने वाले दान और चढ़ावे का वार्षिक लेखा-जोखा तैयार करना अनिवार्य है।
- हर वर्ष ट्रस्ट के वित्तीय खातों का ऑडिट कराया जाना भी नियमों का हिस्सा है।
सरकार कितना कर सकती है हस्तक्षेप?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वायत्त धार्मिक न्यास है। ऐसे में सरकार सीधे उसके प्रशासनिक फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
वर्तमान विवाद भी मंदिर की चल संपत्ति यानी नकदी और सोना-चांदी जैसे चढ़ावे से जुड़ा बताया जा रहा है। अचल संपत्ति या ट्रस्ट के स्वामित्व वाले संसाधनों को लेकर कोई मामला सामने नहीं आया है।
इसलिए सबसे पहला निर्णय स्वयं ट्रस्ट को ही लेना होगा। SIT की रिपोर्ट मिलने के बाद ट्रस्ट अपनी आंतरिक कार्रवाई या प्रशासनिक निर्णय ले सकता है।
अखिलेश यादव ने उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच एजेंसी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं जांच रिपोर्ट ही गायब न हो जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच में देरी से सबूत प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है।
सरकार के सामने क्यों है संवैधानिक चुनौती?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के सामने दो बड़ी संवैधानिक और धार्मिक चुनौतियां हैं।
पहली, सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि सरकार धार्मिक न्यासों के नियमित कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। हालांकि यदि किसी धार्मिक संस्था में गंभीर कुप्रबंधन या अनियमितता साबित होती है, तो सीमित अवधि के लिए प्रशासनिक हस्तक्षेप की अनुमति दी जा सकती है।
दूसरी चुनौती धार्मिक परंपराओं से जुड़ी है। जिन लोगों के नाम इस मामले में सामने आए हैं, उनमें ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा का भी उल्लेख किया जा रहा है। वे रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के यजमान रहे हैं। सनातन परंपरा में प्राण प्रतिष्ठा कराने वाले व्यक्ति पर मंदिर और विग्रह की देखरेख की विशेष धार्मिक जिम्मेदारी मानी जाती है। ऐसे में किसी भी कार्रवाई के दौरान धार्मिक और कानूनी दोनों पहलुओं का संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए आवश्यक होगा।
आगे क्या होगा?
अब पूरे मामले की निगाहें SIT की रिपोर्ट पर टिकी हैं। रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपे जाने के बाद ट्रस्ट और सरकार दोनों अपने-अपने स्तर पर आगे की कार्रवाई पर निर्णय ले सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि राम मंदिर ट्रस्ट एक स्वतंत्र धार्मिक न्यास है, इसलिए अंतिम प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार ट्रस्ट के पास ही रहेगा, जबकि सरकार केवल जांच और कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं तक सीमित भूमिका निभा सकती है।








