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  • ‘कॉकटेल 2’ ने फिर साबित किया: हर ग्लैमरस लड़की विलेन नहीं होती, बदल रही है बॉलीवुड की सोच

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    बॉलीवुड में लंबे समय तक एक तयशुदा फॉर्मूला रहा है—जो लड़की सबसे ज्यादा ग्लैमरस, बेबाक और आत्मनिर्भर होती है, वही आखिर में कहानी की “विलेन” बन जाती है। लेकिन होमी अदजानिया की फिल्म ‘कॉकटेल 2’ इस सोच को एक बार फिर चुनौती देती नजर आती है।

    19 जून को रिलीज हुई यह फिल्म शाहिद कपूर, कृति सेनन और रश्मिका मंदाना की तिकड़ी के साथ दर्शकों के बीच आई है। हालांकि फिल्म एक नई कहानी लेकर आती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चर्चा कृति सेनन के किरदार ‘एली’ को लेकर हो रही है, जिसे कई दर्शक 2012 की ‘कॉकटेल’ की वेरोनिका (दीपिका पादुकोण) का नया रूप मान रहे हैं।

    फिर वही पुराना सवाल—क्या बोल्ड लड़की ही गलत होती है?

    2012 की ‘कॉकटेल’ में दीपिका पादुकोण की वेरोनिका एक मॉडर्न, पार्टी-लविंग और बेबाक लड़की थी। दूसरी ओर डायना पेंटी की मीरा शांत, पारंपरिक और सादगी पसंद दिखाई गई थी।

    फिल्म रिलीज होने के समय ज्यादातर लोगों ने वेरोनिका को रिश्ते बिगाड़ने वाली लड़की माना, लेकिन समय बीतने के साथ दर्शकों की सोच बदली। आज वेरोनिका को उस फिल्म का सबसे ईमानदार, भावुक और दिलदार किरदार माना जाता है।

    अब ठीक वैसी ही बहस ‘कॉकटेल 2’ में कृति सेनन के किरदार एली को लेकर शुरू हो गई है।

    एली बनाम दिया

    फिल्म में रश्मिका मंदाना दिया के किरदार में हैं, जो एक सुलझी हुई और मासूम लड़की दिखाई गई है। वहीं कृति सेनन की एली जिंदगी को खुलकर जीने वाली, आत्मविश्वासी और बेबाक महिला है।

    कहानी तब मोड़ लेती है जब दिया खुद अपनी पुरानी दोस्त एली से अपने पार्टनर कुणाल (शाहिद कपूर) की वफादारी परखने के लिए उसके साथ फ्लर्ट करने को कहती है।

    यहीं से रिश्तों की उलझन शुरू होती है।

    क्या एली सच में गलत थी?

    शुरुआत में ऐसा लगता है कि एली जानबूझकर कुणाल के करीब आ रही है, लेकिन फिल्म यह भी दिखाती है कि इस पूरे “लव टेस्ट” की शुरुआत खुद दिया करती है।

    धीरे-धीरे एली को भी कुणाल से प्यार हो जाता है। यहीं से दर्शकों का एक वर्ग उसे रिश्ता तोड़ने वाली लड़की मानने लगता है।

    लेकिन फिल्म यह सवाल भी छोड़ती है कि क्या किसी से प्यार हो जाना अपने आप में अपराध है?

    पुराने नजरिए को चुनौती

    फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यही है कि यह ग्लैमरस महिला किरदार को सिर्फ उसके कपड़ों, लाइफस्टाइल या बेबाक अंदाज के आधार पर नकारात्मक साबित नहीं करती।

    एली अपने प्यार के लिए लड़ती है, अपनी भावनाओं को छिपाती नहीं और अंत तक किसी तरह की चालबाजी या बदले की भावना नहीं दिखाती।

    फिल्म के अंत में जब कुणाल और दिया फिर साथ आ जाते हैं, तब भी एली टूटती जरूर है, लेकिन नफरत या बदले का रास्ता नहीं चुनती।

    बदल रही है बॉलीवुड की कहानी

    बीते कुछ वर्षों में बॉलीवुड महिला किरदारों को लेकर अपनी सोच बदलता नजर आया है। अब फिल्मों में यह संदेश दिया जा रहा है कि आत्मनिर्भर, आधुनिक और खुलकर जिंदगी जीने वाली महिला जरूरी नहीं कि गलत ही हो।

    ‘कॉकटेल 2’ इसी बदलाव को आगे बढ़ाती है।

    सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस

    फिल्म रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर भी दर्शकों के बीच बहस छिड़ गई है। कई यूजर्स का कहना है कि एली का किरदार सबसे ज्यादा वास्तविक और भावनात्मक है।

    कुछ लोगों ने लिखा कि 2012 में जिस तरह वेरोनिका को गलत समझा गया था, कहीं वैसा ही एली के साथ भी तो नहीं हो रहा।

    14 साल बाद वही सीख

    2012 की ‘कॉकटेल’ ने वेरोनिका के जरिए जो सवाल छोड़ा था, ‘कॉकटेल 2’ उसी बहस को नए दौर में आगे बढ़ाती है।

    फिल्म यह संदेश देती है कि किसी महिला का आत्मविश्वासी, फैशनेबल और स्वतंत्र होना उसे विलेन नहीं बना देता।

    शायद यही वजह है कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि हर “दिवा” कहानी की खलनायिका नहीं होती—कई बार वही सबसे ज्यादा सच्ची और इंसानी किरदार साबित होती है।

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