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  • इमरजेंसी की 51वीं बरसी: 1975 में इस्तीफा देने की बजाय इंदिरा गांधी ने क्यों चुना दूसरा रास्ता? जानिए उस दौर की पूरी राजनीतिक कहानी

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    देश में वर्ष 1975 में लागू की गई आपातकाल (इमरजेंसी) की 51वीं बरसी के अवसर पर उस समय के राजनीतिक घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में हैं। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक संकट का सामना कर रही थीं। इसके बाद कांग्रेस के भीतर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ और भविष्य की रणनीति पर अलग-अलग राय सामने आई।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ा संकट

    12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली लोकसभा चुनाव से जुड़े मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित किया। इस फैसले के बाद उनके सामने दो प्रमुख विकल्प माने जा रहे थे—एक, सर्वोच्च न्यायालय में अपील करना और दूसरा, अंतिम निर्णय आने तक किसी वरिष्ठ नेता को अंतरिम प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सौंपना।

    बताया जाता है कि कांग्रेस के भीतर इस विषय पर व्यापक चर्चा हुई और कई वरिष्ठ नेताओं के नाम संभावित अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में सामने आए।

    कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राय

    राजनीतिक चर्चाओं के दौरान कुछ नेताओं का मत था कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने तक अंतरिम व्यवस्था बनाई जा सकती है। वहीं दूसरी राय यह थी कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर बने रहना चाहिए।

    उस समय पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनके नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया, जबकि राजनीतिक हलकों में संभावित नेतृत्व परिवर्तन को लेकर भी चर्चाएं चलती रहीं।

    समर्थन जुटाने की कोशिश

    हाई कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस ने देशभर में अपने समर्थन का प्रदर्शन किया। पार्टी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी के नेतृत्व का समर्थन किया और यह कहा कि अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार है।

    इसी दौरान विभिन्न राजनीतिक सभाओं और बैठकों के माध्यम से उनके पक्ष में समर्थन का माहौल बनाने का प्रयास भी किया गया।

    सर्वोच्च न्यायालय का रास्ता चुना

    आखिरकार इंदिरा गांधी ने तत्काल इस्तीफा देने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का निर्णय लिया। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक पद पर बने रहने का फैसला किया।

    इसके बाद देश में राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदले और कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रीय स्तर पर आपातकाल लागू किया गया, जिसने भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

    भारतीय लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अध्याय

    1975-77 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित और विवादास्पद दौरों में गिना जाता है। इस अवधि को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और इतिहासकारों की अपनी-अपनी व्याख्याएं रही हैं।

    आज, इमरजेंसी की 51वीं बरसी पर उस दौर की घटनाओं, राजनीतिक निर्णयों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर फिर से चर्चा हो रही है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने दृष्टिकोण से इस ऐतिहासिक कालखंड को याद कर रहे हैं, जबकि इतिहासकार इसे भारतीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखते हैं।

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