कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के भीतर गहरे मतभेद सामने आते दिखाई दे रहे हैं। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व में मंत्रिमंडल के विस्तार के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की नाराज़गी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। शपथ ग्रहण समारोह से दूरी बनाने का उनका फैसला और मंत्रियों के चयन को लेकर उठे विवाद ने कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि सिद्धारमैया अपने समर्थकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलने के बावजूद कुछ नामों को लेकर असंतुष्ट थे। विशेष रूप से एमएलसी गायत्री शठेगौड़ा को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर उन्होंने आपत्ति जताई। उनका मानना था कि उनकी पसंद के नेता बसवराज शिवन्नावर को अवसर मिलना चाहिए था। वहीं महिला प्रतिनिधित्व के लिए भी उनकी पहली पसंद उमाश्री थीं, लेकिन अंतिम सूची में गायत्री शठेगौड़ा का नाम शामिल किया गया, जिससे विवाद और बढ़ गया।
इस विवाद का असर शपथ ग्रहण समारोह पर भी पड़ा। समारोह निर्धारित समय से देरी से शुरू हुआ और बाद में गायत्री शठेगौड़ा का नाम अंतिम समय में सूची से हटा दिया गया। इससे कांग्रेस नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
इसी बीच एक और बड़ा बदलाव तब देखने को मिला जब उत्तर कन्नड़ जिले से संभावित मंत्री मंकाला वैद्य का नाम अंतिम समय में हटाकर दावणगेरे के वरिष्ठ विधायक एस.एस. मल्लिकार्जुन को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। मल्लिकार्जुन ने दावा किया कि उन्हें मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का फोन आया, जिसके बाद उन्हें मंत्री बनने की जानकारी मिली।
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भी अंतिम सूची से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। बताया जाता है कि उनके करीबी विधायक एच.सी. बालकृष्ण का नाम प्रारंभिक सूची में नहीं था। विरोध के बाद उन्हें शामिल किया गया, जबकि एक अन्य नेता एम. कृष्णप्पा का नाम हटाया गया। वहीं शिवकुमार की करीबी मानी जाने वाली लक्ष्मी हेब्बालकर को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से उनके समर्थकों में भी नाराज़गी बताई जा रही है।
मंत्रिमंडल गठन से पहले कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद से अलग-अलग संभावित मंत्रियों की सूची मांगी थी। इन सूचियों पर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, महासचिव के.सी. वेणुगोपाल, प्रभारी रणदीप सुरजेवाला और राहुल गांधी के स्तर पर चर्चा के बाद अंतिम सूची तैयार की गई।
हालांकि विपक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की संवैधानिक भूमिका को कमजोर किया गया और मंत्रियों की सूची सीधे कांग्रेस हाईकमान से तय की गई। विपक्ष का कहना है कि इससे मुख्यमंत्री केवल औपचारिक भूमिका तक सीमित दिखाई दिए।
कैबिनेट गठन में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की भी कोशिश की गई। अहिंदा समूह, लिंगायत, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, वोक्कालिगा और मुस्लिम समुदायों को प्रतिनिधित्व देकर आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक समीकरण बनाने का प्रयास किया गया। साथ ही जनता दल (सेक्युलर) से कांग्रेस में आए कुछ नेताओं को भी मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया।
इसके बावजूद कई वरिष्ठ नेताओं और विधायकों में असंतोष देखने को मिल रहा है। कांग्रेस के 136 विधायकों वाले सदन में कई जिलों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिला, जबकि कुछ क्षेत्रों को अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है। मंत्री पद न मिलने से कुछ विधायकों ने नाराज़गी जाहिर की है और विरोध के स्वर भी सामने आए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल सरकार की स्थिरता पर कोई तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन यदि पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता रहा तो आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकता है। सिद्धारमैया की नाराज़गी और समर्थक विधायकों की बेचैनी भविष्य में पार्टी की आंतरिक राजनीति को और प्रभावित कर सकती है।
कुल मिलाकर, कर्नाटक में कांग्रेस का यह कैबिनेट विस्तार केवल मंत्रियों की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पार्टी के भीतर नेतृत्व, शक्ति संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इन मतभेदों को किस तरह सुलझाता है और संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने में कितना सफल रहता है।








