भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋषभ पंत का उत्तराखंड में अपना पहला घर बनाने का सपना फिलहाल जमीन की तलाश में अटका हुआ है। ऋषभ पंत ने सोशल मीडिया पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मदद मांगी है। पंत के मुताबिक, वह पिछले करीब तीन वर्षों से अपने घर के लिए ऐसी जगह तलाश रहे हैं, जो उनकी जरूरतों के मुताबिक हो।
ऋषभ पंत का उत्तराखंड से खास जुड़ाव है। रुड़की में जन्मे पंत ने अपनी पोस्ट में कहा कि वह अपने होमटाउन में अपना पहला घर बनाना चाहते हैं और राज्य के विकास में योगदान देना चाहते हैं। हालांकि, उन्हें अब तक अपने मुताबिक सुविधाजनक और पर्याप्त बड़ी जगह नहीं मिल पाई है।
पंत की पोस्ट के बाद उत्तराखंड में जमीन खरीदने से जुड़े भू-कानून एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं।
CM धामी ने पंत को दिया मदद का भरोसा
ऋषभ पंत की पोस्ट पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पंत को उत्तराखंड का गौरव बताते हुए कहा कि उनकी मातृभूमि के प्रति प्रेम और राज्य में वापस आकर योगदान देने की भावना सराहनीय है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि पंत द्वारा उठाए गए विषय के संबंध में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं और वे जल्द ही उनसे संपर्क कर नियमानुसार हरसंभव सहयोग सुनिश्चित करेंगे।
उत्तराखंड में जमीन खरीदने के नियम क्यों चर्चा में?
उत्तराखंड में दूसरे राज्यों के लोगों के लिए जमीन खरीदने के नियम कई अन्य राज्यों की तुलना में अलग हैं। खास तौर पर कृषि और बागवानी भूमि को लेकर 2025 में भू-कानून में कई प्रतिबंध लगाए गए।
नए नियमों के तहत राज्य के 11 पर्वतीय जिलों में बाहरी राज्यों के लोग कृषि और बागवानी की जमीन नहीं खरीद सकते। हालांकि, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को इन प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है।
बाहरी लोग कितनी आवासीय जमीन खरीद सकते हैं?
दिए गए स्रोत के अनुसार, बाहरी राज्य के नागरिकों के लिए आवासीय जमीन खरीदने के मामले में अलग प्रावधान है। वे 250 वर्ग मीटर यानी करीब 300 गज तक की आवासीय जमीन खरीद सकते हैं।
इसके लिए जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को अपने उद्देश्य से संबंधित आधिकारिक शपथ पत्र देना होता है।
इसलिए उत्तराखंड में जमीन खरीदने से पहले यह देखना जरूरी है कि जमीन का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए होना है और वह किस जिले में स्थित है।
11 पहाड़ी जिलों में कृषि भूमि पर रोक
2025 में धामी सरकार द्वारा किए गए भू-कानून संशोधन के तहत उत्तराखंड के 11 पहाड़ी जिलों में बाहरी राज्यों के लोगों के लिए कृषि और बागवानी भूमि खरीदने पर रोक लगाई गई।
हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को इस प्रावधान से बाहर रखा गया है। स्रोत के अनुसार, इन जिलों में अलग परिस्थितियों और औद्योगिक गतिविधियों को देखते हुए यह प्रावधान लागू नहीं किया गया।
जमीन खरीदने से पहले शपथ पत्र जरूरी
दूसरे राज्यों के नागरिकों को जमीन खरीदते समय यह बताना होता है कि जमीन किस उद्देश्य से खरीदी जा रही है। इसके लिए आधिकारिक शपथ पत्र की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।
स्रोत के अनुसार, जिलाधिकारियों के पुराने अधिकार भी सीमित किए गए हैं और जमीन से जुड़ी डील्स की निगरानी एक निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से की जाती है।
2003 में 500 वर्ग मीटर की सीमा
उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद भूमि खरीद के नियमों में समय-समय पर बदलाव किए गए।
2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की सरकार के दौरान बाहरी राज्यों के लोगों के लिए जमीन खरीदने की सीमा 500 वर्ग मीटर तय की गई थी।
इसके बाद भूमि खरीद को लेकर नियमों में और बदलाव किए गए।
2007 में सीमा घटाकर 250 वर्ग मीटर हुई
2007 में बीसी खंडूड़ी सरकार के दौरान बाहरी राज्यों के लोगों के लिए आवासीय जमीन खरीदने की सीमा 500 वर्ग मीटर से घटाकर 250 वर्ग मीटर कर दी गई।
इस बदलाव के बाद बाहरी व्यक्ति के लिए आवासीय भूमि खरीद की अधिकतम सीमा 250 वर्ग मीटर रह गई।
2017-18 में भू-कानून में बड़ी ढील
2017-18 में तत्कालीन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के दौरान भूमि कानून में बड़ा बदलाव किया गया। स्रोत के अनुसार, उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 में संशोधन से जुड़े प्रावधानों के तहत पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा समाप्त कर दी गई।
इसके अलावा देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में भूमि की चकबंदी यानी सीलिंग को भी खत्म किया गया।
यह बदलाव उत्तराखंड में पर्यटन और निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था।
2025 में फिर सख्त हुए भू-कानून
2025 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने उत्तराखंड के भू-कानून में फिर से बदलाव किया।
नए प्रावधानों के तहत राज्य के 11 पहाड़ी जिलों में बाहरी राज्यों के लोगों के लिए कृषि और बागवानी भूमि खरीदने पर रोक लगा दी गई।
हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया।
क्या बाहरी लोग उत्तराखंड में जमीन खरीद ही नहीं सकते?
उत्तराखंड में कृषि और बागवानी भूमि पर प्रतिबंध का अर्थ यह नहीं है कि दूसरे राज्यों का कोई व्यक्ति वहां जमीन नहीं खरीद सकता।
स्रोत के अनुसार, आवासीय जमीन के लिए 250 वर्ग मीटर तक खरीद का प्रावधान मौजूद है। हालांकि, इसके साथ निर्धारित शर्तों और प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है।
जमीन खरीदने से पहले उसके उपयोग, जिले और उस पर लागू भू-कानून की स्थिति को देखना जरूरी है।
ऋषभ पंत के मामले में असली परेशानी क्या है?
ऋषभ पंत का मामला बाहरी व्यक्ति द्वारा उत्तराखंड में जमीन खरीदने की समस्या से अलग बताया गया है। स्रोत के अनुसार, पंत उत्तराखंड के निवासी हैं और उन पर बाहरी लोगों के लिए लागू 2025 के नए भू-कानून प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।
पंत की समस्या जमीन खरीदने की कानूनी अनुमति से ज्यादा उनकी जरूरत के मुताबिक जमीन उपलब्ध होने से जुड़ी है।
उन्होंने अपनी पोस्ट में बताया है कि वह पिछले तीन वर्षों से अपने लिए ऐसी जगह तलाश रहे हैं, जहां वह सुविधाजनक और पर्याप्त बड़ा घर बना सकें।
उत्तराखंड में जमीन पर सख्ती क्यों?
स्रोत के अनुसार, उत्तराखंड सरकार का मानना है कि पहाड़ी राज्य में जमीन सीमित है। बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने से स्थानीय लोगों के पास उपलब्ध जमीन कम हो सकती है।
इसके अलावा जमीन की कीमतों में बढ़ोतरी होने से स्थानीय लोगों के लिए जमीन खरीदना मुश्किल होने की आशंका भी जताई जाती है।
इसी वजह से स्थानीय लोगों के जमीन संबंधी अधिकारों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से भू-कानूनों को फिर सख्त किया गया।
ऋषभ पंत का उत्तराखंड में अपना घर बनाने का मामला सामने आने के बाद राज्य के भू-कानून और जमीन खरीदने के नियम फिर चर्चा में हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार पंत के सामने बाहरी व्यक्ति के रूप में जमीन खरीदने की कानूनी पाबंदी नहीं है। उनकी परेशानी अपनी जरूरत के मुताबिक बड़ी और सुविधाजनक जमीन उपलब्ध न होने से जुड़ी है। वहीं, 2025 के भू-कानून के तहत उत्तराखंड के 11 पहाड़ी जिलों में बाहरी लोगों के लिए कृषि और बागवानी भूमि खरीदने पर सख्ती की गई है।








